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सकल मनोरथ सिद्धि मन्त्र

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सकल मनोरथ सिद्धि मन्त्र

मन्त्रः-
“भव भेषज रघुनाथ जसु,
सुनहिं जे नर अरु नारि ।

तिन्ह कर सकल मनोरथ,
सिद्ध करहिं त्रिसरारि ।।”

मन्त्र की प्रयोग विधि और लाभः-
कामना के अनुसार माला लेकर उससे इस मन्त्र के ५०० जप नित्य करते हुए ३१ दिन तक करें । जब आवश्यकता हो तब पान या इलायची को इस मन्त्र से शक्तिकृत करके उस व्यक्ति को खीलायें, जिससे कार्य करवाना हो ।
इस मन्त्र के प्रयोग से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं ।

 

 

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रामकथा साहित्य का पर्यवेक्षण

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रामकथा साहित्य का पर्यवेक्षण

रामयुग के सम्बन्ध में जानकारी का आधिकारिक स्रोत यद्यपि “वाल्मीकि रामायण” है, तथापि रामकथा का वर्णन न केवल संस्कृत साहित्य, वरन् भारत की अन्य भाषाओं के साहित्य में भी हुआ है, साथ ही अन्य देशों में भी रामकथा का प्रचलन मिलता है ।

संस्कृत में रामकथा
यद्यपि राम का उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मण्डल के अनुवाक 86 में मन्त्र रामायण प्रकरण में भी मिलता है । ‘श्रीरामतापनी उपनिषद’ में भी राम का वर्णन है, परन्तु रामकथा का विशद् वर्णन पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, श्रीमद्-भागवतपुराण आदि पुराणों के साथ-साथ महाभारत के वनपर्व में भी मिलता है । इसके अलावा संस्कृत साहित्य में रामकथा पर आधारित अनेक ग्रन्थों की रचना हुई है । कृष्णामाचार्य ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर’ में ऐसे 54 महाकाव्यों की सूची दी है, जो रामकथा पर आश्रित हैं । इसी प्रकार उन्होंने रामकथा पर आधारित अनेक रुपकों एवं चम्पू साहित्य का भी उल्लेख किया है । कालिदास कृत रघुवंश, भट्टि कृत रावणवध, अभिनन्द कृत रामचरित, क्षेमेन्द्र कृत रामायण मंजरी, माधव भट्ट कृत राघव पाण्डवीय, रघुनाथ कृत रामायणसार, कुमारदास कृत जानकी हरण, धीरनाभ कृत कुन्दमाला, राजशेखर कृत बालरामायण, शक्तिभद्र कृत आश्चर्य चूड़ामणि, मुरारी कृत अनर्घराघव, दामोदरमिश्र कृत महानाटक, जयदेव कृत प्रसन्न राघव, रामभद्र कृत जानकी परिणय, महादेव कृत अद्भुत दर्पण, भोज कृत रामायण चम्पू, अनन्ताचार्य कृत चम्पूराघव, दिवाकर कृत अमोघ राघव इत्यादि उल्लेखनीय है । संस्कृत साहित्य में उपर्युक्त की तुलना में निम्नलिखित का रामकथा के वर्णन के सम्बन्ध में निशेष महत्त्व हैः-
१॰ योगवशिष्ठः- इसे ‘वासिष्ठ रामायण’, ‘आर्ष रामायण’, ‘ज्ञान-वासिष्ठ‘, ‘महारामायण’ इत्यादि नामों से जाना जाता है । महर्षि वसिष्ठ द्वारा रचित होने के कारण इसे उपर्युक्त नामों से जाना जाता है । इसमें ‘वाल्मीकि रामायण’ से अधिक श्लोक होने के कारण इसे ‘महारामायण’ की संज्ञा मिली है । इसमें महर्षि वसिष्ठ के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक उपदेश हैं । इसमें 27687 श्लोक तथा 6 प्रकरण हैं । डॉ॰ बी॰एल॰ आत्रेय के अनुसार इसका रचनाकाल सातवीं शताब्दी है ।
२॰ अध्यात्म रामायणः- रामानन्द सम्प्रदाय में अध्यात्म रामायण का विशेष महत्त्व है । इसे वेदव्यास रचित माना जाता है, क्योंकि यह ब्रह्माण्डपुराण का एक भाग माना जाता है । कतिपय विद्वानों के अनुसार इसकी रचना रामानन्द जी ने की थी । वस्तुतः निश्चयात्मक रुप से इसके रचयिता के बारे में कहा नहीं जा सकता । रचनाकाल भी अस्पष्ट है । इसे 16वीं शताब्दी से पूर्व का ग्रन्थ माना जाता है । तुलसीकृत रामचरितमानस तथा एकनाथ की मराठी रामायण पर इसका विशेष प्रभाव है । इसमें रामकथा का उल्लेख मिलता है । कई स्थानों पर यह कथा वाल्मीकि रामायण से भिन्न है ।
३॰ अद्भुत रामायणः- रामकथा के अद्भुत प्रसंगों के कारण यह रामायण ‘अद्भूत रामायण’ के नाम से लोकविश्रुत है । इसमें सीताजी को मन्दोदरी की पुत्री, सीता के द्वारा कालीरुप धारण कर विश्रवा मुनि के पुत्र सहस्रस्कन्ध रावण का पुष्कर में वध करना जैसे प्रसंग दिए गए हैं ।
४॰ आनन्द रामायणः- आनन्द रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि को माना गया है, परन्तु यह ‘अध्यात्मरामायण’ के उपरान्त लिखी गई है, क्योंकि इस पर अध्यात्मरामायण का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । इसमें 12252 श्लोक हैं और यह 9 काण्डों में विभक्त है ।
५॰ तत्त्वसंग्रह रामायणः- इस रामायण की रचना 17वीं शताब्दी मे ब्रह्मानन्द ने की थी । ब्र्हमानन्द ने ‘रामायण तत्त्वदर्पण’ नामक ग्रन्थ भी लिखा है ।
६॰ भुशुण्डी रामायणः- इसे आदिरामायण, महारामायण आदि भी कहा जाता है । इस पर श्रीमद्-भागवत् की कृष्ण कथा का प्रभाव परिलक्षित होता है ।
७॰ मन्त्र रामायणः- इसके रचनाकार नीलकंठ हैं । नीलकंठ ने मन्त्र भागवत की भी रचना की है ।
८॰ रामविजयः- रामविजय की रचना 1800 ई॰ के लगभग रघुनाथ उपाध्याय ने की थी ।
९॰ रामलिंगामृतः- 18 सर्गों में विभक्त इस ग्रन्थ की रचना 1608 ई॰ में काशी में अद्वैत ने की थी ।
१०॰ राघवोल्लासः- इसकी रचना काशी ही में अद्वैत नामक सन्यासी ने की थी ।
११॰ उदारराघवः- इसकी रचना 14वीं शताब्दी के मध्य में साकल्यमल्ल (मल्लाचार्य) ने की थी ।
१२॰ श्रीरामकर्णामृतम्- इसकी रचना शंकर भगवत् पाद ने की है । इसमें चार आश्वास एवं 452 श्लोक हैं ।

जैन साहित्य में रामकथा
जैन साहित्य में भी रामकथा का वर्णन मिलता है । ऐसे प्रमुख जैन-ग्रन्थ निम्नानुसार हैं -
१॰ पउमचरियः- पउमचरिय प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है । इसकी रचना विमलसूरि ने 60 ई॰ के लगभग की थी ।
२॰ पद्मचरित (पद्मपुराण) – यह संस्कृत भाषा में रचित है । इसकी रचना रविषेण ने 577 में की थी ।
३॰ त्रिषष्टिलक्षण महापुराणः- इसमें 63 शलाका पुरुषों का जीवन वृत्त दिया गया है । इसके दो भाग हैं । आदिपुराण और उत्तरपुराण । आदिपुराण की रचना जिनसेन ने की थी तथा उत्तरपुराण की रचना जिनसेन के शिष्य गुणभद्र ने की थी । यह ग्रन्थ नवीं शताब्दी का है ।
४॰ त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित तथा सीतारावणकथानकम्- इन दोनों ग्रन्थों की रचना हेमचन्द्र ने की थी । इनमें भी रामकथा का उल्लेख मिलता है ।
५॰ रामदेवपुराणः- इसकी रचना 15 वीं शताब्दी में जिनदास ने की थी, इसे ‘जिनदास रामायण’ भी कहा जाता है ।

बोद्धग्रन्थों में रामकथा

बोद्धग्रन्थों में रामकथा का उल्लेख हुआ है । इनमें सर्वप्रमुख दशरथ जातक नामक ग्रन्थ है ।

अन्य भाषाओं में रामकथा
१॰ रामचरितमानसः- इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने 1580 ई॰ में अयोध्या में अवधि-बृज मिश्रित हिन्दी भाषा में की थी । इसमें 7 काण्ड, 9009 चौपाइयाँ, 1142 दोहे, 88 सोरठे, 182 छन्द, 35 श्लोक हैं । उत्तर-भारत में रामचरितमानस वाल्मीकि कृत रामायण से भी अधिक लोकप्रिय है ।
२॰ प्रेमरामायणः- प्रेमरामायण रामचरितमानस पर पद्यात्मक संस्कृत टीका है । इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य रामू द्विवेदी ने की थी । इसका दूसरा नाम ‘बुध-बोधिनी’ है ।
३॰ भावार्थ रामायणः- इस रामायण की रचना मराठी भाषा में संत शिरोमणि एकनाथ जी ने की थी । महाराष्ट्र में भावार्थ रामायण को वही सम्मान प्राप्त है, जो उत्तर भारत में तुलसी कृत रामचरितमानस को है ।
मराठी साहित्य में रामदासजी का साहित्य भी रामकथा पर आधारित है । उनके ग्रन्थ दासबोधआत्माराम इत्यादि में रामकथा का वर्णन मिलता है । इनके अतिरिक्त मोरोपंत कृत अष्टोत्तरशतरामायण। श्रीधर कृत रामविजय, रामदास कृत लघुरामायण इत्यादि भी उल्लेखनीय है ।
४॰ विलंकारामायणः- विलंकारामायण उड़िया भाषा में रचित है । इसकी रचना शारलादास ने 15वीं शताब्दी में की थी । इसमें रावण से बलवान् विलंकेश का उल्लेख भी मिलता है ।
५॰ जगमोहनरामायणः- जगमोहनरामायण उड़िया भाषा की रामायण है । इसकी रचना बलरामदास ने की थी ।
६॰ विचित्र रामायणः- विचित्र रामायण की रचना उड़िया भाषा में विश्वान खुंटिया ने की है ।
उड़िया भाषा में उपर्युक्त रामायणों के अतिरिक्त चिकिटि राकेन्द्र कृत ‘चिकिटि रामायण’ पीताम्बर कृत ‘दाण्डी रामायण’, श्रीकृष्णचन्द्र पट्टनायक कृत ‘रामायण’ इत्यादि भी उल्लेखनीय है ।
७॰ कृत्तिवास रामायणः- यह रामायण बांग्ला भाषा में है । इसकी रचना महाकवि कृत्तिवास ने 15वीं शताब्दी में की थी ।
८॰ रंगनाथ रामायणः- इस रामायण की रचना तेलगु भाषा में सन् 1380 में गोलबुद्धराज ने की थी ।
९॰ रामावतार चरितः- इसे प्रकाश रामायण या तकनीकी रामायण भी कहा जाता है । इसकी रचना दिवाकर प्रकाश भट्ट ने 19वीं शताब्दी में की थी । यह कश्मीरी भाषा में रामकथा पर आधारित साहित्य में विष्णुप्रताप रामायण, शंकर रामायण, आनन्द रामावतार चरित, शर्मा रामायण, ताराचन्द रामायण, अमर रामायण, रामगीता इत्यादि भी उल्लेखनीय है ।
१०॰ कम्ब रामायणः- तमिल के प्रसिद्ध कम्बन ने तमिल भाषा में कम्ब रामायण की रचना 12वीं शताब्दी में की थी । इसे रामावतारम् भी कहा जाता है । इसमें छह काण्ड हैं । उत्तरकाण्ड नहीं है । काण्डों को पटल में विभक्त किया गया है ।
११॰ तोरवे रामायणः- कन्नड़ भाषा की तोरवे रामायण का प्रणयन महाकवि बत्तलेश्वर ने तोरवे गाँव में की थी । इनका समय 15वीं-16वीं शताब्दी माना जाता है । इसमें लगभग 5000 पद्य हैं । दक्षिण भारत में तोरवे रामायण का प्रचलन सर्वाधिक है ।
१२॰ असमिया रामायणः- 14वीं शताब्दी से 16 शताब्दी के मध्य माधव कंदली ने असमिया भाषा में रामायण की रचना की थी ।
असमिया भाषा में माधव कंदली कृत रामायण के अलावा अनन्त कंदली कृत रामायण, दुर्गावर कृत गीति रामायण, अनन्त ठाकुर कृत कीर्तनिया रामायण, रघुनाथ महंत कृत अद्भुत रामायण, रघुनाथ महंत कृत शत्रुंजय रामायण, असमिया कृत्तिवास कृत अंगद रामायण इत्यादि रामकथा साहित्य भी उल्लेखनीय है ।
१३॰ गोविन्द रामायणः- सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने ‘दशम ग्रन्थ’ में 24 अवतारों की कथा का सुन्दर काव्यात्मक वर्णन किया है । भगवान् राम का जीवन चरित दशमेश पिता ने ‘रामावतार’ शीर्षक से हिन्दी जगत् को प्रदान किया, जिसे कतिपय विद्वानों ने गोविन्द रामायण भी कहा है ।
१४॰ राजस्थानी भाषा में रामकथाः- राजस्तानी भाषा में रामकथा पर आधारित साहित्य का प्रणयन प्रचुर मात्रा में हुआ है । जाम्भोजी परम्परा के कवि मेंह ने 1518 ई॰ में 261 छन्दों वाली ‘मेंह रामायण’ की रचना की थी । ईसरदास बारहठ ने 16वीं शताब्दी में रामकथा पर आधारित गुण हरिरस नामक ग्रन्थ निर्मित किया । इसी प्रकार सुन्दरदास ने रामचरित, कृष्णा आढ़ा ने रघुवर जस प्रकाश, माधोदास ने राममंगल एवं रामरक्षा, रामचरण ने रामप्रताप, करणीदान कविया ने सूरजप्रकाश, मंछाराम सेवग ने रघुनाथ रुपक इत्यादि ग्रन्थों की रचना की थी ।
१५॰ गिरधर रामायणः- गिरधर रामायण गुजराती भाषा की लोकप्रिय रामायण है । इसकी रचना कवि गिरधर ने की थी । इसके अतिरिक्त गुजराती साहित्य में भालण कृत रामचरित एवं रामबालचरित तथा उद्धव कृत उद्धवरामायण भी उल्लेखनीय है ।

सम्प्रदाय विशेषों में रामकथा आधारित साहित्य
सम्प्रदाय विशेष में रामकथा पर आधारित साहित्य सृजन भारी मात्रा में क्षेत्रीय भाषाओं में हुआ है । इन सम्प्रदायों में रामनुज सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, स्वामी नारायण सम्प्रदाय उल्लेखनीय है ।

वैदेशिक रामकथा साहित्य
चीन में 251 ई॰ में किंग कृत लिऊ तऊत्व, 472 ई॰ में त्वांग किंग कृत त्व पाओ तथा 7वीं शताब्दी के लंका सिंहा नामक ग्रन्थ रामकथा पर आधारित है । 9वीं शताब्दी में तुर्किस्तान में खोतानी रामायण का, 3री शताब्दी में तिब्बती रामायण का, 10वीं शताब्दी में मंगोलिया की रामकथा, 10वीं शताब्दी में जापान की रामकथा (साम्बो ऐ कोतोबा कृत) का प्रणयन हुआ था । जापान में ही 12वीं शताब्दी में हेबुत्सु ने नवीन रामकथा की रचना की थी । इंडोनेशिया में रामकथा साहित्य प्रणयन अधिक मात्रा में हुआ है । यहाँ 8वीं शताब्दी से ही इस प्रकार के साहित्य की रचना हुई है । हरिश्रय, रामपुराण, अर्जुनविजय, रामविजय, वीरतन्त्र, कपिपर्व, चरित्र रामायण, ककविन रामायण, जावी रामायण, मिसासुर रामकथा, केचक रामकथा इत्यादि ग्रन्थों का प्रणयन इंडोनेशिया में हुआ है । पड़ोसी देश थाइलैण्ड में रामकियेन, मलेशिया में 13वीं शताब्दी का हकायत श्रीराम और हकायत महाराज रावण नामक ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है । लंका में भी जानकी हरण नामक लुंकापति कुमारदास ग्रन्थ की रचना हुई है । इसका रचनाकाल कालिदास के समकालीन माना जाता है । म्यांमार में भी रामकथा साहित्य का प्रचलन दिखाई देता है । यहाँ के उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं – रामवस्तु, महाराम, राम तोन्मयो, रामताज्यी, रामयग्रान, पोन्तवराम इत्यादि ।

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मिल गई रावण की ममी ?

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मिल गई रावण की ममी ?

ऐसा दावा किया जा रहा है कि वर्तमान में श्रीलंका के रागला शहर के निकट निवास करने वाले नागा लोगों के पूर्वजों ने रावण की ममी को विशाल ताबूत में सुरक्षित रखा था । रावण की ममी सुरक्षित रखी होने के दावे पर श्रीरामायण रिसर्च कमेटी की टीम शोध कर रही है । यह टीम श्रीलंका के रागला शहर के निकट स्थित दुर्गम पहाड़ियों में बनी रावण गुफाओं तक पहुँच गई है । उस दल ने वहाँ दो खम्बों पर रखे 18 फुट लम्बे, 6 फुट चौड़े और 6 फुट ऊँचे ताबूत (बॉक्सनुमा पत्थर) को देखा है । उसी ताबूत में रावण की ममी होने का दावा किया जा रहा है । और तो, और उस क्षेत्र मे रहने वाले नागा लोगों का तो मानना है कि रावण को पुनर्जीवित किया जा सकता है ।
इस कमेटी में शामिल शोधकर्ता अशोक कैंथ का कहना है कि बहरहाल, उस ताबूत को खम्भों से उतारने में एक-डेढ़ करोड़ रुपए का खर्च होगा ।
रावण का दाहसंस्कार
इस दावे के विपरीत वाल्मीकि रामायण में रावण के दाह संस्कार का उल्लेख मिलता है । रावण वध के पश्चात् मन्दोदरी के करुण क्रंदन सुन श्रीराम ने विभीषण को दाह संस्कार करने की आज्ञा दीः
एतस्मिन्नन्तरे रामो विभीषणमुवाच ह ।
संस्कारः क्रियतां भ्रातुः स्त्रीगणः
रिससानत्यताम् ।।

अर्थात् उसी समय श्रीराम ने विभीषण से कहा कि, “इन स्त्रियों को धैर्य बँधाओ और अपने भाई का दाह-संस्कार करो ।”
स ददौ पावकं तस्य विधियुक्तं विभीषणः ।
स्नात्वा चैवार्द्रवस्त्रेण तिलान् दर्भविमिश्रितान् ।।
उदकेन च सम्मिश्रान् प्रदाय विधिपूर्वकम् ।
ताः स्त्रियोऽनुनयामास सान्त्यित्वा पुनः पुनः ।।

अर्थात् तदन्तर विभीषण ने चिता में विधि के अनुसार आग लगाई । तत्पश्चात् स्नान कर भीगे वस्त्र पहने हुए ही उसने तिल, कुश और जल से रावण को विधिवत् जलांजलि दी और रावण की स्त्रियों को सांत्वना देकर उनसे घर चलने का अनुनय-विनय किया ।
जाहिर है, यदि रावण का दाहसंस्कार हुआ था, तो रावण गुफा में रखी ममी रावण की कैसे हो सकती है ?
ममी मेघनाद की तो नहीं ?
जब रावण का दाह संस्कार हुआ तो अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि रावण गुफाओं में स्थित वह ममी किसकी है ? रामायण में मेघनाद के दाह संस्कार का उल्लेख नहीं है । सम्भव है वह ममी मेघनाद की हो और नागा लोग नागवंशीय हों, जिनके राजा की पुत्री सुलोचना से मेघनाद का विवाह हुआ था । हो सकता है, नागवंश के लोगों ने अपने जमाता का शव इस आशा के साथ सुरक्षित रख लिया हो कि उसे पुनर्जीवित किया जा सके ।
हालांकि अभी तो नागा लोगों द्वारा बताई जा रही दंतकथा के अतिरिक्त कोई अन्य साक्ष्य इस तथ्य को प्रमाणित नहीं करता कि कथित रावण गुफा में दो खम्भों पर ताबूत में ममी किसकी है ? उसे उतारने और खोलने के बाद ही यह पता चलेगा कि उसमें ममी है भि या नहीं। और है तो, वह किसकी है ?

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नवदुर्गोपनिषत्

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Navdurgopnishat

नवदुर्गोपनिषत्

उक्तं चाथर्वणरहस्ये ।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीनवदुर्गामहामन्त्रस्य किरातरुपधर ईश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, अन्तर्यामी नारायणः किरातरुप धरेश्वरो नवदुर्गागायत्री देवता, ॐ बीजं, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।
करन्यासः- हंसनी ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः । शंखिनी ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । चक्रिणी ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । गदिनी ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः । शरिणी ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । त्रिशूलधारिणी ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
ह्रदयादिन्यासः- हंसनी ह्रां हृदयादि नमः । शंखिनी ह्रीं शिरसे स्वाहा । चक्रिणी ह्रूं शिखायै वषट् । गदिनी ह्रैं कवचाय हुम् । शरिणी ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । त्रिशूलधारिणी ह्रः अस्त्राय फट् ।
ॐ भूर्भुवः स्वरोम् इति दिग्बन्धः ।
ध्यानम्
अरिशंख कृपाण खेट बाणान्सुधनुष्क शूलमथ कर्तरीं दधाना ।
भजतां महिषोत्तमांगसंस्था नवदूर्वासदृशी श्रियेऽस्तु दुर्गा ।।
हेमप्रख्यामिन्दु खण्डान्तमौलिं शंखारिष्टाभीति हस्तां त्रिनेत्राम् ।
हेमाब्जस्थां पीतवर्णां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्यरुपां नमामि ।।
ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै तेजस्वि
नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ॐ हरिः ॐ ।

पञ्चपूजा
ॐ लं पृथिव्यात्मने गन्ध समर्पयामि । ॐ हं आकाशात्मने पुष्पं समर्पयामि । ॐ यं वाय्वात्मने धूपं समर्पयामि । ॐ रं अग्न्यात्मने दीपं समर्पयामि । ॐ वं अमृतात्मने अमृतनैवेद्यं समर्पयामि ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं उत्तिष्ठ पुरुष किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितम् । यदि शक्यमशक्यं वा तन्मे भगवति शमय शमय स्वाहा । ॐ नमश्चण्डिकायै नमः ।
हेतुकं पूर्वपीठे तु आग्नेय्यां त्रिपुरान्तकम् । दक्षिणे चाग्निवैतालं नैऋत्यां यमजिह्वकम् ।।४।।
कालाख्यं वारुणे पीठे वायव्यां तु करालिनम् । उत्तरे एकपादं तु ईशान्यां भीमरुपिणम् ।।५।।
आकाशे तु निरालम्बं पाताले वडवानलम् । यथा ग्रामे तथाऽरण्ये रक्ज़ मां बटुकस्तथा ।।६।।
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।७।।

ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै नमः ।
प्रयोग विषये
ब्राह्मण्यै नमः । वारुणि खल्वि माहेश्वर्यै नमः । कुल्यवासिन्यै कुमारिण्यै नमः । जयन्तीपुरलाहिवाराहिण्यै नमः । अष्ट-महाकालि माहेश्वर्यै नमः । चित्रकूट इन्द्राण्यै नमः त्रिपुरब्रह्मचारिण्यै नमः । एक वृक्षशुभिन्यै महालक्ष्म्यै नमः । त्रिपुरब्रह्माण्डनायक्यै नमः । एतानि क्ष क्षं त्रैलोक्यवशंकराणि । बीजाक्षराणि ॐ ह्रीं कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा । ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सकलनरमुखभ्रमरीम् । ॐ क्लीं ह्रीं सकल राजमुख भ्रमरीम् । ॐ क्रौं सौं सकलदेवतामुख भ्रमरीम् । ॐ क्लीं क्लीं सकलकामिनीमुख भ्रमरीम् । ॐ ईं सौः सकलदेशमुख भ्रमरीम् । हसखफ्रें त्रैलोक्यचित्त भ्रमरीम् । ॐ क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः । उग्रभैरवादि-भूत-प्रेत पिशाचचित्त भ्रमरीं हुं क्षुं हुं क्लीं राजमन्त्र-यन्त्र भ्रमरीं हुं क्षुं हुं क्लीं सिद्ध-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र भ्रमरीं हुं क्षुं हुं क्लीं साध्य मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र भ्रमरीं सकलसुरासुर सर्व-मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र भ्रमरीं सर्वक्षोभिणी सर्वक्लेदिनी सकल मनोन्मादकरी आं ह्रीं क्रौं परम-कल्याणी महायोगिनी ।
ॐ महाविद्यां प्रवक्ष्यामि महादेवेन निर्मिताम् । चिन्तितां किरातरुपेण मारणां हृदयनन्दिनीम् ।।८।।
उत्तमा सर्व-विद्यानां सर्वभूतवशंकरी । सर्व-पापक्षयकरी सर्व-शत्रु-निवारिणी । ॐ कुलकरी गोत्रकरी धनकरी धान्यकरी बलकरी यशस्करी विद्याकरी उत्साह-बल-वर्धिनी भूतानां विजृम्णिणी स्तम्भिनी मोहिनी द्राविणी सर्व-मन्त्र-प्रभञ्जिनी सर्व-विद्या-प्रभेदिनी सर्व-ज्वरोत्सादकरी ऐकाहिकं द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकमर्द्धमासिकं मासिकं द्विमासिकं त्रिमासिकं षाण्मासिकं सांवत्सरिकं वातिकं पैत्तिकं श्लेष्मिकं सान्निपातिकं सन्तत-ज्वरं शीत-ज्वरम् उष्ण-ज्वरम् विषम-ज्वरं ताप-ज्वरं च गण्डमाला लूततालु वर्णानां त्रासिनी सर्पाणां त्रासिनी सर्वान् त्रासिनी शिरःशुलाक्षिशूलकर्णशूलसन्तशूल बाहुशूल हृदयशूल कुक्षिशूल पक्षशूल गुदशूल गुल्मशूल लिंगशूल योनिशूल पादशूल सर्वांगशूल विस्फोटकादि इति आत्मरक्षा परोक्ष प्रत्यक्षरक्षा अग्निरक्षा अघोररक्षा वायु रक्षा उदकरक्षा महान्धकारोल्का विद्युदनिलचरोशस्त्रास्त्रे मां रक्ष रक्ष स्वाहा
महादेवस्य तेजसां भयंकराविष्टदेवता बन्धयामि पन्थानुगतचौराद्रक्षते बन्धकस्य कण्टकं बन्धयामि महादेवस्य पञ्चशीर्षेण पाणिना महादेवस्य तेजसा सर्वशूलान् कहपिंगलेन कण्टक मयरुद्रांगी ॐ अं आं मातंगी इं ईं मातंगी उं ऊं मातंगी ऋं ॠं मातंगी लृं ॡं मातंगी एं ऐं मातंगी ओं औं मातंगी अं अः मातंगी स्वर स्वर ब्रह्मदण्ड विश्वर विश्वर रुद्रदण्ड प्रज्वल प्रज्वल वायुदण्ड प्रहर प्रहर इन्द्रदण्ड भक्ष भक्ष निऋतिदण्ड हिलि हिलि यमदण्ड नित्योपवादिनि हंसिनी शंखिनी चक्रिणी गदिनी शूलिनी त्रिशूलधारिणी हुं फट् स्वाहा । आयुर्विद्यां च सौभाग्यं धान्यं च धनमेव च । सदा शिवं पुत्रवृद्धिं देहि मे चण्डिके शुभे ।।९।।
अथातो मन्त्रपादा भवन्ति । ॐ छायायै स्वाहा । चतुरायै स्वाहा । हलि स्वाहा । पीलि स्वाहा । हरं स्वाहा । हरहरं स्वाहा । गन्धर्वाय स्वाहा । गन्धर्वाधिपतये स्वाहा । यक्षाय स्वाहा । यक्षाधिपतये स्वाहा । रक्षसे स्वाहा । रक्षोऽधिपतये स्वाहा । ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा । उल्कामुखी स्वाहा । रुद्रमुखी स्वाहा । रुद्रजटी स्वाहा । ब्रह्मविष्णुरुद्रतेजसे स्वाहा । या इमा भुत-प्रेत-पिशाच-राक्षस-नवग्रह- भूत-वेताल-शाकिनी-डाकिन्यः कूष्माण्डवासश्चत्वारो राजपुरुषः कलह-पुरुषो वा तेषां दिशं बन्धयामि । दुर्दिशोबन्धयामि । हस्तौ बन्धयामि । श्रोत्रे बन्धयामि । जिह्वां बन्धयामि । घ्राणं बन्धयामि । बुद्धिं बन्धयामि । गतिं बन्धयामि । मतिं बन्धयामि । अन्तरिक्षं बन्धयामि । पातालं बन्धयामि । यममुखेन पञ्चयोजन-विस्तीर्णं बन्धयामि । रुद्रो बध्नातु । रुद्रमण्डलं रुद्रः सह-परिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता-सहितं रुद्र-मण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा । त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारिकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।। १० ।।
वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ११ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । प्राच्यां दिशि इन्द्रो देवता ऐरावतारुढो हेमवर्णो वज्रहस्त इन्द्रो बध्नातु । इन्द्रमण्डलमिन्द्रः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित मिन्द्रमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। १ ।। इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः । अस्माकमस्तु केवलः ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । आग्नेय्यां दिशि अग्निर्देवता मेषारुढो रक्तवर्णो ज्वालाहस्तोऽग्निर्बध्नातु
अग्निमण्डलमग्निः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित मण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। २ ।। ॐ अग्निं दूत वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । याम्यां दिशि यमो देवता महिषारुढो नीलवर्णो दण्डहस्तो यमो बध्नातु । यममण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ३ ।। ॐ यमाय सोमं सुनुत यमाय जुहूता हविः । यमं ह यज्ञोगच्छत्यग्निदूतो अरंकृतः ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । नैर्ऋत्यां दिशि निर्ऋतिमण्डलं निर्ऋतिः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहितं निर्ऋतिमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष
अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ४ ।। ॐ मोषुणः परापरा निर्ऋतिर्दुर्हणावधीत् । पदीष्ट तृष्णया सह ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । वारुण्यां दिशि वरुणो देवता मकरारुढः श्वेतवर्णः पाशहस्तो वरुणो बध्नातु । वरुणमण्डलं वरुणः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित वरुणमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ५ ।। ॐ इमं मे॰ ।। १ ।। तत्त्वा यामि॰ ।। २ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ३ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । वायव्यां दिशि वायुर्देवता मृगारुढो धूम्रवर्णो ध्वजहस्तो वायुर्बध्नातु । वायुमण्डलं वायुः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित वायुमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ६ ।। ॐ तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत । आवाँस्या वृणीमहे ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । कौबेर्यां दिशि कुबेरो देवता अश्वारुढः पीतवर्णो गदाङ्कुशहस्तः कुबेरो बध्नातु । कुबेरमण्डलं कुबेरः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित कुबेरमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष
अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ७ ।। ॐ सोमो धेनुं सोमो अर्वन्तमाशुं सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति । सादन्यं विदथ्यं सभेयं पितृश्रवणं यो देदाशदस्मै ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ईशान्यां दिशि ईशानो देवता वृषारुढः स्फटिकवर्णस्त्रिशूलहस्त ईशानो बध्नातु । ईशानमण्डलमीशानः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित मीशानमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ८ ।। ॐ तमीसानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ऊर्ध्वायां दिशि ब्रह्मा देवता हंसारुढो रक्तवर्णः कमण्डलु-हस्तो ब्रह्मा बध्नातु । ब्रह्म-मण्डलं ब्रह्मा सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहितं ब्रह्म-मण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ९ ।। ॐ ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामृषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम् । श्येनो गृध्राणां स्वधितिर्वनानां सोमः पवित्रमत्येति रेभन् ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । अधस्ताद्दिशि वासुकि देवता कूर्मारुढः पद्महस्तो वास्तुकिः बध्नातु । वासुकिमण्डलं वासुकिः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित वासुकिमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। १० ।। ॐ नमो अस्तु सर्पेभ्यो॰ ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । अवान्तरस्यां दिशि विष्णुर्देवता गरुडारुढः श्यामवर्णश्चक्रहस्तो विष्णुर्बध्नातु । विष्णुमण्डलं विष्णुः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवता सहित विष्णुमण्डलं प्रत्यक्षं बन्ध-बन्ध मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ११ ।। ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे॰ ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । प्राच्यां दिशि इन्द्रः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु त्रिशूलको नाम राक्षसः शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। १ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । आग्नेय्यां दिशि अग्निः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु मारीचको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। २ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । याम्यां दिशि यमः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु एकपिङ्लको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ३ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ३ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । नैऋत्यां दिशि निऋतिः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु सत्यको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ४ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ४ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । प्रतीच्यां दिशि वरुणः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु लम्बको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ५ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ५ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । वायव्यां दिशि वायुः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु प्रलम्बको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ६ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ६ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । कौबेर्यां दिशि कुबेरः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु अश्वालको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ७ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ७ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ईशान्यां दिशि ईशानः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु उन्मत्तको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ८ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ८ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । उर्ध्वायां दिशि ब्रह्मा सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु आकाश वासी नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ९ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। ९ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । अधस्ताद्दिशि वासुकिः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु पातालवासी नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। १० ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । आवान्तरस्यां दिशि विष्णुः सहपरिवारो देवता-प्रत्यधि-देवतास्तद्दिक्षु महाभीमको नाम राक्षसस्तस्य अष्टादशकोटि भूत-प्रेत-पिशाच ब्रह्मराक्षस शाकिनी डाकिनी काकिनी हाकिनी याकिनी राकिनी वैतालकामिनीग्रहान् बन्धयामि मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष-रक्ष । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्र-कवचायास्त्राय राज-चौर-सर्प-सिंह-व्याघ्राग्नि मम सर्वोपद्रव नाशनाय । ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं क्लुं प्रों आं ह्रीं क्रौं हुं फट् स्वाहा ।। ११ ।। वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्मद्विषो जहि अव ब्रह्मदिषो जहि ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । प्राच्यां दिशि । ॐ नमो भगवते इन्द्राणिवज्रहस्ताभ्यां सपरिवारकस्य सर्वतो रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । आग्नेय्यां दिशि । ॐ नमो भगवते अग्निज्वालहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । याम्यां दिशि । ॐ नमो भगवते यमकालदण्डहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । नैर्ऋत्यां दिशि । ॐ नमो भगवते खड्गकंकालहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । वारुण्यां दिशि । ॐ नमो भगवते वारुणिपाशहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । वायव्यां दिशि । ॐ नमो भगवते वायविवेधहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । कौबेर्यां दिशि । ॐ नमो भगवते कौबेरीगदांकुशहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ईशान्यां दिशि । ॐ नमो भगवते ईशानित्रिशूलडमरुहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ऊर्ध्वयां दिशि । ॐ नमो भगवते ब्रह्माणि स्रुक्-स्रुवकमण्डलल्वक्षसूत्रांकुशहस्तैः मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । ॐ नमो पातालवासिनि विषगलहस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । अवान्तरस्यां दिशि । ॐ नमो भगवते श्रीमहालक्ष्मी पद्मारुढा पद्महस्ताभ्यां मम सपरिवारकस्य सर्वतो मां रक्ष रक्ष हुंजटी स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ।
ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः । ॐ नमो भगवते रुद्राय । शिरो रक्षतु ब्रह्माणी मुखं माहेश्वरी तथा कण्ठं रक्षतु वाराही ऐन्द्री चैव भुजद्वयम् ।। १ ।। चामुण्डा हृदयं रक्षेत्कुक्षिं रक्ज़ेच्च वारुणी । वैष्णवी रक्ष पादौ मे पृष्ठदेशे धनुर्धरी ।। २ ।। यथा ग्रामे तथा क्षेत्रे रक्षस्व मां पदे पदे । सर्व-मङ्ल-माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके । शरण्य-त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुऽते ।। ३ ।।
ॐ ब्राह्मि माहेश्वरि कौमारि वैष्णवि वाराहि इन्द्राणि चामुण्डे सिद्धचामुण्डेश्वरि गणेश्वरि क्षेत्रपाल नारसिंहि महालक्ष्मि सर्वतो दुर्गे हुं फट् स्वाहा । ॐ ऐं ह्रीं श्रीं दुं हुं फट् । कनक-वज्रवैदुर्य-मुक्तालङकृत-भूषणे एहि एहि आगच्छ आगच्छ मम कर्णे प्रविश्य भूत-भविष्य-वर्तमान-काल-ज्ञान दूरदृष्टि-दूर-श्रवणं ब्रुहि-ब्रुहि अग्नि-स्तम्भन-शत्रु-स्तम्भन शत्रु-मुख-स्तम्भन शत्रु-गति-स्तम्भन शत्रु-मति-स्तम्भन परेषांगति सर्वमति-शत्रूणां वाग्जृम्भणं स्तम्भनं कुरु कुरु शत्रु-कार्य-हानि-करि मम कार्यसिद्धिकरि शत्रूणामुद्योग-विध्वंसकरि वीरचामुण्डि निहाटकहाटक धारिणी नगरी-पुरी-पट्टणआस्थान संमोहिनी असाध्य-साधिनी । ॐ ह्रीं श्रीं देवि हन हुं फट् स्वाहा ।। १ ।।
ॐ आं ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रूं सौः ग्लौं श्रीं क्रौं एहि एहि भ्रमराम्बा हि सकलजगन्मोहनाय मोहनाय सकलाण्डजपिण्डजान् भ्रामय भ्रामय जरा प्रजावशंकरि संमोहय संमोहय महामाये अष्टादशपीठरुपिणि अमलवरयूं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर कोटि-सूर्य-प्रभाभासुरि चन्द्रजटी मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भस्मीकुरु भस्मीकुरु विश्वमोहिनी हुं क्लीं हुं हुं फट् स्वाहा ।। २ ।।
ॐ नमो भगवते कामदेवाय इन्द्राय वसाबाणाय इन्द्र संदीपबाणाय क्लीं क्लीं संमोहनबाणाय ब्लूं ब्लूं संतापनबाणाय सः सः वशीकरणबाणाय कम्पित कम्पित हुं फट् स्वाहा । क्लीं नमो भगवते कामदेवाय श्रीं सर्व-जन-प्रियाय सर्व-जन-सम्मोहनाय ज्वल-ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल हन-हन वद-वद तप-तप सम्मोहय सम्मोहय सर्व जनं मे वशं कुरु कुरु स्वाहा ।। ३ ।।
ॐ ह्रां श्रीं ष्णीं क्ष्म्प्रैं हूस्त्रौं सहस्राराय हुं फट् स्वाहा । ॐ नमो विष्णवे । ॐ नमो नारायणाय । ॐ जय जय गोपीजन-वल्लभाय स्वाहा । सहस्रार ज्वालावर्त क्ष्म्प्रौं हन-हन हुं फट् स्वाहा । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । श्रीमन्नारायणस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये । श्रीमते नारायणाय नमः । उग्रवीरं महा-विष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ।। ४ ।।
भगवन् सर्व-विजय सहस्राराय राजित । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि श्रीकरं श्रीसुदर्शनम् ।। ५ ।।
अरुणी वारुणी चैव सविग्रहनिवारिणी । सर्व-कर्मकरि । ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा । अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यक् ग्राहयित्वा । ततो महाविद्या सिद्धयति । अशिक्षितं नोपयुञ्जीत । अहं न जाने न च पार्वतीश एक विंशतिवाराणि परिजाप्य शुचिर्भवेत् ।। ६ ।।
पत्रं पुष्पं फलं दद्यात् स्त्रियो वा पुरुषोऽपि वा । अवश्यं वशमित्याहुरात्मना च परेण वा ।। ७ ।। महाविद्यावतां पुंसां मनः क्षेत्रं करोति यः । सप्तरात्रौ व्यतीतायां शत्रूणां तद्विनश्यति ।। ८ ।। ॐ कुबेर ते मुखं रौद्रं नन्दिमानन्दिमावह । ज्वरं मृत्युभयं घोरं विषं नाशय मे ज्वर ।। ९ ।।
ॐ नमो भगवते रुद्राय हृदये अमृताभिवर्षाय मम ज्वर-रोग-शांति कुर-कुरु स्वाहा । ॐ काल-काल महा-काल काल-दण्ड नमोस्तुऽते । कालदण्ड-निपातेन भूम्यामन्तर्हितं ज्वरं हन्ति । लिखित्वा यस्तु पश्यति समुद्रस्योत्तरे तीरे मारीचो नाम राक्षसस्तस्य मूत्रपुरीषाभ्यां हुताशनं शमय शमय स्वाहा । हिमवत्युत्तरे पार्श्वे चपला नाम यक्षिणी । तस्या नूपुरशब्देन विशल्या भव गर्भिणी । जातवेदसे सुन वाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरिताऽत्यग्निः ।। १०
भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ।। १ ।। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । प्रतिकूलकारिणी नश्येत् । अनुकूलकारिणी अस्तु । महा-देवी च विद्महे विष्णु-पत्नी च धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।। २ ।।
ॐ ब्रूं ह्रीं श्रीं ब्रह्मकोशजी मां रक्ष-रक्ष हुं जटी स्वाहा । पञ्चम्यां च नवम्यां च दशम्यां च विशेषतः । पठित्वा तु महाविद्यां श्रीकामः सर्वदा पठेत् ।। ११ ।।
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् । श्रीर्मे भजतु । अलक्ष्मीर्मे नश्यतु ।। १ ।। यदन्ति यच्च दूरके भयं विन्दति मामिह । पवमानवितज्जहि । यदुत्थितं दुःखं भवति तत्सर्वं शमय शमय स्वाहा ।। २ ।। ॐ गायत्र्यै स्वाहा । ॐ सावित्र्यै स्वाहा । ॐ सरस्वत्यै स्वाहा । तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि । तन्नः इन्द्रः प्रचोदयात् ।। ३ ।। तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ।। ४ ।। तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ।। ५ ।। तत्पुरुषाय विद्महे चक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो नन्दिः प्रचोदयात् ।। ६ ।। तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि । तन्नो षण्मुखः प्रचोदयात् ।। ७ ।। तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि । तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ।। ८ ।। वेदात्मनाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि । तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।। ९ ।। नारायणाय विद्महे वासुदरवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।। १० ।। मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि । तन्नोऽनङ्ग प्रचोदयात् ।। ११ ।। वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदँष्ट्राय धीमहि । तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात् ।। १२ ।। भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि । तन्नो आदित्यः प्रचोदयात् ।। १३ ।। वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि । तन्नो अग्निः प्रचोदयात् ।। १४ ।। कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गेः प्रचोदयात् ।। १५ ।।
सहस्रपरमा देवी शतमूला शतांकुरा । सर्व हरतु मे पापं दूर्वा दुःस्वप्ननाशिनी ।। १२ ।। काण्डात्काण्डात्प्ररो हन्ती॰ । अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुंधरे । शिरसा धारयिष्यामि रक्षस्व मां पदे पद ।। १३ ।। अत्रिणा त्वा क्रिमे हन्मिकण्वेन जमदग्निना । विश्वावसोर्ब्रह्मणा हतः कृमीणा राजा अप्येषाः स्थपतिर्हतः । अथो माताऽथो पिता अथो स्थूरा अथो क्षुद्राः अथो कृष्णाः अथो श्वेताः अथो आशातिका हताः श्वेताभिः सह सर्वे हताः आहरावद्यश्रुतस्य हविषो यथा तत्सत्यं यदमुं यमस्य जम्भयोः आदधामि तथा हि तत् । खण्फण्म्रसि ब्रह्मणा त्वा शपामि । ब्रह्मणस्त्वा शपथेन शपामि । घोरेण त्वा भृगूणां चक्षुषा प्रेक्षे । रौद्रेण त्वाऽङ्गिरसा मनसा ध्यायामि । अघस्य त्वा धारया विध्यामि । अधरो मत्पद्यस्वासौ उत्तुद शिमिजा वरि तल्पेजे तल्प उत्तुद गिरी रनुप्रवेशय मरीचीरुपसंनुद यावदितः पुरस्तादुदयाति सूर्यः तावदितोऽमुं नाशय योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः खट् फट् जहि छिन्धि छिन्धि हन्धि कट् इति वाचः क्रूराणि परिबाहिणीदं नमस्ते अस्तु मा मा हि सीः द्विषन्तं मेऽभिनाशय तं मृत्यो मृत्यवे नय अरिष्टं रक्ष अरिष्टं भञ्ज भञ्ज स्वाहा ।
ॐ ह्रीं कृष्णवाससे नारसिंहवदे महाभैरवि ज्वल ज्वल विद्युज्ज्वलज्ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यङ्गिरे क्ष्म्रीं क्ष्म्यैं नमो नारायणाय घ्रिणुः सूर्यादित्यों सहस्रा हुं फट् । अव ब्रह्मद्विषोजहि । सर्पोलूक काक कङ्क कपोतादि वृश्चिकोग्रदंष्ट्राकरोग्रविषान्मे महा-भूत-प्रेत-पिशाच-रा्क्षस सकल-किल्विषादि महारोगविषाग्निरोगविषं कुरु-कुरु स्वाहा । अक्षिस्पन्दं च दुःस्वप्नं भुजस्पन्दं च दुर्मतिम् । दुश्चिह्नं दुर्गतिं रोगं भयं नाशय शांकरि ।। १४ ।।
महा-विद्यां कृतवतो योस्माकं द्वेष्टि योऽरिष्टं स्मरति यावदेकविंशतिं कृत्वा तावदधिकं नाशय । ब्रह्मविद्यामिमां देवि नित्यं सेवेत यः सुधीः । ऐहाकामुष्मिकं सौख्यं सिद्धयत्येव न संशयः ।। १५ ।। एनां विद्यां महा-विद्यां यो दूषयति मानवः । सो ऽवश्यं नाशमाप्नोति षण्मासादचिरेण वै ।। १६ ।। अग्रतः पृष्ठतः पार्श्वे ऊर्ध्वतो रक्ष मे सदा । चण्डघण्टा विरुपाक्षी त्वां भजे जगदीश्वरीम् ।। १७ ।। एवंविधां महाविद्यां त्रिसन्ध्यं स्तौति मानवः । दृष्ट्वा जनैर्दुष्टजनाः सर्वमोहवशं गताः ।। १८ ।। तामग्नि वर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनी कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां दुःशमनाये गताः ।। १९ ।। मातर्मे मधु कैटभघ्रि महिषप्राणापहारोद्यमे हेलानिर्मितधूम्रलोचनवधे हे चण्ड-मुण्डार्दिनि । निःशेषीकृतरक्तबीजदनुजे नित्ये निशुम्भापहे शुम्भध्वंसिनि संहराशु दुरितं दुर्गे नमस्तेऽम्बिके ।। २० ।। कालदण्डपरं मृत्युविजया बन्धयाम्यत्हम् । पञ्चयोजनविस्तीर्णं मृत्योश्च मुख मण्डलम् । तस्माद्रक्ष महाविद्ये भद्रकालि नमोस्तुऽते ।। २१ ।।
अव ब्रह्मद्विषो जहि । वारिजलोचन-सहपरीगतिं वारयासुरकरनिकरैः पूरितमेघद्रुगानां दापितागोपकन्यके सहोदरवतु । अव ब्रह्मद्विषो जहि । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सिद्धलक्ष्मी स्वाहा । ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणा चीरमात्मनः । वासा सि मम गावश्च अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रिय आनिरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति । श्रियं वसाना अमृततत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ श्रिय एवैनं तच्छ्रियामादधाति संततमृचा वषट्कृत्यं संतत्यै संधियते प्रजया पशुभिर्य एवं वेद । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं क्लूं प्रों हुं फट् स्वाहा । अव ब्रह्मद्विषो जहि ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

 

 

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नाम जपन क्यों छोड़ दिया……….

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नाम जपन क्यों छोड़ दिया-
नाम जपन क्यों छोड़ दिया

क्रोध न छोड़ा झूठ न छोड़ा
सत्य बचन क्यों छोड दिया

झूठे जग में दिल ललचा कर
असल वतन क्यों छोड दिया

कौड़ी को तो खूब सम्भाला
लाल रतन क्यों छोड दिया

जिन सुमिरन से अति सुख पावे
तिन सुमिरन क्यों छोड़ दिया

खालस इक भगवान भरोसे
तन मन धन क्यों ना छोड़ दिया

नाम जपन क्यों छोड़ दिया

 

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