May
17

हनुमद्-बीसा
।।दोहा।।
राम भक्त विनती करूँ, सुन लो मेरी बात ।
दया करो कुछ मेहर उपाओ, सिर पर रखो हाथ ।।
।।चौपाई।।
जय हनुमन्त, जय तेरा बीसा, कालनेमि को जैसे खींचा ।।१
करुणा पर दो कान हमारो, शत्रु हमारे तत्क्षण मारो ।।२
राम भक्त जय जय हनुमन्ता, लंका को थे किये विध्वंसा ।।३
सीता खोज खबर तुम लाए, अजर अमर के आशीष पाए ।।४
लक्ष्मण प्राण विधाता हो तुम, राम के अतिशय पासा हो तुम ।।५
जिस पर होते तुम अनुकूला, वह रहता पतझड़ में फूला ।।६
राम भक्त तुम मेरी आशा, तुम्हें ध्याऊँ मैं दिन राता ।।७
आकर मेरे काज संवारो, शत्रु हमारे तत्क्षण मारो ।।८
तुम्हरी दया से हम चलते हैं, लोग न जाने क्यों जलते हैं ।।९
भक्त जनों के संकट टारे, राम द्वार के हो रखवारे ।।१०
मेरे संकट दूर हटा दो, द्विविधा मेरी तुरन्त मिटा दो ।।११
रुद्रावतार हो मेरे स्वामी, तुम्हरे जैसा कोई नाहीं ।।१२
ॐ हनु हनु हनुमन्त का बीसा, बैरिहु मारु जगत के ईशा ।।१३
तुम्हरो नाम जहाँ पढ़ जावे, बैरि व्याधि न नेरे आवे ।।१४
तुम्हरा नाम जगत सुखदाता, खुल जाता है राम दरवाजा ।।१५
संकट मोचन प्रभु हमारो, भूत प्रेत पिशाच को मारो ।।१६
अंजनी पुत्र नाम हनुमन्ता, सर्व जगत बजता है डंका ।।१७
सर्व व्याधि नष्ट जो जावे, हनुमद् बीसा जो कह पावे ।।१८
संकट एक न रहता उसको, हं हं हनुमंत कहता नर जो ।।१९
ह्रीं हनुमंते नमः जो कहता, उससे तो दुख दूर ही रहता ।।२०
।। दोहा।।
मेरे राम भक्त हनुमन्ता, कर दो बेड़ा पार ।
हूँ दीन मलीन कुलीन बड़ा, कर लो मुझे स्वीकार ।।
राम लषन सीता सहित, करो मेरा कल्याण ।
संताप हरो तुम मेरे स्वामी, बना रहे सम्मान ।।
प्रभु राम जी माता जानकी जी, सदा हों सहाई ।
संकट पड़ा यशपाल पे, तभी आवाज लगाई ।।
।।इति श्रीमद् हनुमन्त बीसा श्री यशपाल जी कृत समाप्तम्।।

Print

May
02

हनुमत् ‘साबर’ मन्त्र प्रयोग
 ।। श्री पार्वत्युवाच ।।
 हनुमच्छावरं मन्त्रं, नित्य-नाथोदितं तथा ।
 वद मे करुणा-सिन्धो ! सर्व-कर्म-फल-प्रदम् ।।
 ।। श्रीईश्वर उवाच ।।
 आञ्जनेयाख्यं मन्त्रं च, ह्यादि-नाथोदितं तथा ।
 सर्व-प्रयोग-सिद्धिं च, तथाप्यत्यन्त-पावनम् ।।
 ।। मन्त्र ।।
 “ॐ ह्रीं यं ह्रीं राम-दूताय, रिपु-पुरी-दाहनाय अक्ष-कुक्षि-विदारणाय, अपरिमित-बल-पराक्रमाय, रावण-गिरि-वज्रायुधाय ह्रीं स्वाहा ।।”
 विधिः- ‘आञ्जनेय’ नामक उक्त मन्त्र का प्रयोग गुरुवार के दिन प्रारम्भ करना चाहिए। श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख बैठकर दस सहस्त्र जप करे। इस प्रयोग से सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। मनोनुकूल विवाह-सम्बन्ध होता है। अभिमन्त्रित काजल रविवार के दिन लगाना चाहिए। अभिमन्त्रित जल नित्य पीने से सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसी प्रकार आकर्षण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण आदि सभी प्रयोग उक्त मन्त्र से किए जा सकते हैं। यथा-
 एतद् वायु-कुमाराख्यं, मन्त्रं त्रैलोक्य-पावनम् ।
 गुरु-वारे चाञ्जनेयं, समारभ्य सु-बुद्धिमान् ।।
 कांक्षितां कन्यकां वाऽथ, युवाऽऽप्नोत्येव पार्वति !
 आञ्जनेयस्य पुरतो, ह्ययुतं जपमाचरेत् ।।
 कज्जलं च रवौ ग्राह्यं, खाने पाने च पार्वति !
 दातव्यं त्रि-दिनं सम्यक्, स्वयमाकर्षणं भवेत् ।।
 मन्त्रेणानेन देवेशि ! मन्त्रितं जल-पानतः ।
 सर्व-रोग-विनिर्मुक्तो, जीवेद् वर्ष-शतं तथा ।।
 ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ निशायाः कज्जलं तथा ।
 ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ ताम्बुलं चन्दनादिकम् ।।
 दातव्यं शतधाऽऽमन्त्र्य, वन्यमामरान्तिकम् ।
 श्मशान-भस्म चादाय, सहस्त्रं मन्त्रितं प्रिये ।।
 खाने पाने प्रदातव्यं, भोज्य-वस्तुनि वा प्रिये ! ।
 प्रातः-काले च जप्तव्यं, त्रि-सप्त-दिनमादरात् ।।
 जिह्वा-स्तम्भनमाप्नोति, वाचस्पति-समोऽपि वा ।
 विप्र-चाण्डालयोः शल्यं, रवौ मध्यन्दिने प्रिये ! ।।
 गृहीत्वा पञ्च-वर्णान् तु, कन्यका-सूत्र-वेष्टानात् ।
 निखनेच्छत्रु-गेहे तु, सद्यो विद्वेषणं भवेत् ।।
 पक्ष-मात्रेण देवेशि ! पशु-पक्षि-मृगादयः ।
 तत्तद्-वैरि-भयं शल्यं, रवौ संग्रह्य बुद्धिमान् ।।
 कीलं कृत्वा शत्रु-गेहे, निखन्योच्चाटनं भवेत् ।
 विप्र-चाण्डालयोः शल्यमर्के, चार्कस्य मूलकम् ।।
 चतुर्विधेन सम्वेष्टय, नील-सूत्रेण मन्त्रयेत् ।
 निखनेच्छत्रु-गेहे तु, शयनागार-मध्यतः ।।
 पक्षान् मारणमाप्नोति, नात्र कार्या विचारणा ।।
 केरलं मन्त्रममलमाञ्जनाख्यं सु-पावनम् ।
 सर्व-प्रयोग-कृन् मन्त्रं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम् ।।
 ।। मन्त्र।।
 “ॐ नमो भगवते हनुमते, जगत्प्राण-नन्दनाय, ज्वलित-पिंगल-लोचनाय, सर्वाकर्षण-कारणाय ! आकर्षय आकर्षय, आनय आनय, अमुकं दर्शय दर्शय, राम-दूताय आनय आनय, राम आज्ञापयति स्वाहा।”
 विधिः- उक्त ‘केरल′- मन्त्र का जप रविवार की रात्रि से प्रारम्भ करे। प्रतिदिन दो हजार जप करे। बारह दिनों तक जप करने पर मन्त्र सिद्धि होती है। उसके बाद पाँच बालकों की पूजा कर उन्हें भोजनादि से सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा कर चुकने पर साधक को रात्रि में श्री हनुमान जी स्वप्न में दर्शन देंगे और अभीष्ट कामना को पूर्ण करेंगे। इस मन्त्र से ‘आकर्षण’ भी होता है। यथा-
 एतन्मन्त्रं कुलेशानि ! आञ्जनेयं समर्चयेत् ।
 धूपोपहार-विधिना, रात्रौ भानु-दिनादितः ।।
 द्वादशाहे भवेत् सिद्धिः, द्वि-सहस्त्र-जपादिना ।
 तदन्ते वटुकानेव, भोजयेद् वाण संख्यया ।।
 आञ्जनेयस्तु गिरिजे ! रात्रौ स्वप्ने समागतः ।
 मन्त्र-सिद्धिमवाप्नोति, देवता च प्रसीदति ।।
 भानु-विम्बोपरि सम्यङ्, नदी-मधऽये तु साधकः ।
 जपेत् सहस्त्र-संख्यकं, सिञ्चयन् वाम-पाणिना ।।
 तन्मधऽयस्था कुलेशानि ! नाना-मकर-कच्छपाः ।
 समायान्ति च निश्शेषं, शिवस्य वचनं यथा ।।
 वाम-पाद-रजो ग्राह्यं, स्व-प्रियस्य कुलेश्वरि !
 तत् प्रातरम्बुना सम्यक्, प्राशयेन्मन्त्र-योगतः ।।
 आदाय वाम-हस्तेन, प्रजपेदयुतं तदा ।
 स्वयमागच्छते शीघ्रं, शिवस्य वचनं तथा ।।
 कर्णाटकाख्यं महा-मन्त्रं, आञ्जनेयस्य पार्वति !
 शाबरं मन्त्रमनघे ! वक्ष्येऽहं तव सुव्रते ! ।।
 ।।मन्त्र।।
 “ॐ यं ह्रीं वायु-पुत्राय ! एहि एहि, आगच्छ आगच्छ, आवेशय आवेशय, रामचन्द्र आज्ञापयति स्वाहा ।”

 विधिः- ‘कर्णाटक’ नामक उक्त मन्त्र को, पूर्ववत् पुरश्चरण कर, सिद्ध कर लेना चाहिए। फिर यथोक्त-विधि से ‘आकर्षण’ प्रयोग करे। यथा-
 मन्त्रस्तु खाने पाने, पूर्ववत् पुरश्चर्यमामन्त्र-सिद्धिः ।
 ताम्बूलेन कुलेशानि ! स्त्रीणामाकर्षणं भवेत् ।
 पुष्पेणैव च राजानं, चन्दनैर्विप्रजं कुलम ।।
 शूद्राणां फल-योगेन, ह्याकर्षण-करं भवेत्। ।
 आकर्षणं च वैश्यानां, सितया च गुड़ेन च ।।
 आन्ध्रं मन्त्रं प्रवक्षयामि, चाञ्जनेयं सु-पावनम् ।
 सर्व-रोग-प्रयोगेषु, पाठात् सिद्धि-करं कलौ ।।
 ।।मन्त्र।।
 ॐ नमो भगवते ! असहाय-सूर ! सूर्य-मण्डल-कवलीकृत ! काल-कालान्तक ! एहि एहि, आवेशय आवेशय, वीर-राघव आज्ञापयति स्वाहा।”

 विधिः- उक्त ‘आन्ध्र’ मन्त्र के पुरश्चरण की भी वही विधि है। सिद्ध-मन्त्र द्वारा सौ बार अभिमन्त्रित भस्म को शरीर में लगाने से सर्वत्र विजय मिलती है। यथा-
 पूर्ववत् पुरश्चर्य, पूर्ववत् वटुक-भोजनम् ।
 पूर्व-वच्च प्रयोगं तु, कुर्यान् मान्त्रिक-कोविद् ।।
 शत-वारं मन्त्रितं तु, भस्मोद्धूलनमाचरेत् ।
 रणे राज-कुले चैव, स्वभाव विजयो भवेत् ।।
 गुर्जरं शाबरं मन्त्रं, आञ्जनेयं सु-पावनम् ।
 वद मे करुणा-सिन्धो ! ह्यादि-नाथोदितं पुरा।।
 ।।मन्त्र।।
 “ॐ नमो भगवते अञ्जन-पुत्राय, उज्जयिनी-निवासिने, गुरुतर-पराक्रमाय, श्रीराम-दूताय लंकापुरी-दहनाय, यक्ष-राक्षस-संहार-कारिणे हुं फट्।”

 विधिः- उक्त ‘गुर्जर’ मन्त्र का दस हजार जप रात्रि में भगवती दुर्गा के मन्दिर में करना चाहिए। तदन्तर केवल एक हजार जप से कार्य-सिद्धि होगी। इस मन्त्र से अभिमन्त्रित तिल का लड्डू खाने से और भस्म द्वारा मार्जन करने से भविष्य-कथन करने की शक्ति मिलती है। तीन दिनों तक अभिमन्त्रित शर्करा को जल में पीने से श्रीहनुमानजी स्वप्न में आकर सभी बातें बताते हैं, इसमें सन्देह नहीं यथा-
 एतन्मन्त्रं कुलेशानि ! दुर्गालये बुद्धिमान् ।
 जपेत् तत्र निशा-काले ह्ययुतं नियमेन च ।।
 मन्त्र-सिद्धिमवाप्नोति, देवता च प्रसीदति ।
 तदारभ्य तु देवेशि ! साध्य-कर्म-समन्वितम् ।।
 भवेत् सहस्त्रमेकैकं, दुर्गायाः पुरतो बुधः ।
 कार्य-सिद्धिमवाप्नोति, नात्र कार्या विचारणा ।।
 एतन्मन्त्रेण देवेशि ! तिल-पिष्टस्तु बुद्धिमान् ।
 पलमेकं भक्षयित्वा, भस्म-मार्जनतः प्रिये ! ।।
 गतागतश्च वदति, नात्र कार्या विचारणा ।
 वार-त्रयं मन्त्रितं च, शर्करोदक-पानतः ।।
 स्वप्ने चैवाञ्जनी-सूनुः, सर्वं वदति निश्चितम् ।
 एतच्छावर-मन्त्रं च, ह्याञ्जनेयख्यमुत्तमम् ।।
 सर्व-सिद्धि-प्रदं लोके, देवैरपि सु-दुर्लभम् ।।
 ।।इति शाबर-चिन्तामणि-ग्रन्थोक्तं हनुमत्-साबर-मन्त्र-प्रयोगः समाप्तम्।। 

Print

, , , ,

Apr
28

शाबर-मन्त्र-साधना में गुरु-तत्त्व
आदि-गुरु तो भगवान् सदाशिव ही हैं। उन्हीं के अवतार-स्वरुप ‘नव-नाथ’ ही ‘शाबर-मन्त्र-विज्ञान’ के प्रचारक लौकिक गुरु माने गये हैं। इन नाथों के सम्बन्ध में निम्न पद्यात्मक साहित्य का मनन अपेक्षित है।
१॰ नव-नाथ-माला
‘आदि-नाथ’ महेश आकाश-रुप छाय रहे ।
‘उदय-नाथ’ पार्वती पृथ्वी-रुप भाए हैं ।
‘सत्य-नाथ’ ब्रह्मा जी जिनका है जल-रुप ।
वही तो कृपा कर सृष्टि को रचाए हैं ।
विष्णु ‘सन्तोष-नाथ’ तेज खाँडा खड्ग-स्वरुप ।
राज्पाट-अधिकारी वही तो कहाए हैं ।
अचल ‘अचम्भेनाथ’ जिनका है शेष-रुप ।
पृथ्वी का भार सब शीश पर उठाए हैं ।
गज-बली ‘कन्थभ-नाथ’ सिद्धि देता हार ।
हस्ति-रुपी घाड़ गण-पति कहलाए हैं ।
ज्ञान-पारखी चन्द्रमा-सिद्ध हैं ‘चौरंगी-नाथ’ ।
अठार भार वनस्पति में वही समाए हैं ।
माया-पति दादा-गुरु कृपालु ‘मत्स्येन्द्र-नाथ’ ।
सब ही को अन्न-धन-कपड़ा पुराए हैं ।
गुरु तो ‘गोरक्ष-नाथ’ स्वयं ज्योति-स्वरुप जो ।
विश्व भर योग-शक्ति उदार फैलाए हैं ।
बड़े हैं जो भाग्य-वन्त जिन योग प्राप्त किया ।
नव-नाथ ‘नव-नाथ’ गुरु-गण गाए हैं ।
नाथ ये त्रिलोक ‘नव-नाथ’ को नमन कर ।
नव-नाथ-नाम शुभ मेरे मन भाए हैं ।
।।दोहा।।
श्री ‘नव-नाथ’ को चुनऊँ, दीजिए शुभ आशीष ।
आप ही मम सर्वस्व हैं, आपहि हैं मम ईश ।।
करें कृपा मुझ दीन पर, करूँ सुयश गुण-गान ।
‘नव-नाथ-माला’ शुभ गुनूँ, कीजिए बुद्धि प्रदान ।।
जिसके पठन-श्रवण से, मिटे त्रिविध भव-ताप ।
अचल मोक्ष-पद-पावहीं, जपिहैं जो चित लाय ।।

२॰ नव-नाथ-स्वरुप
‘आदि-नाथ’ सदा-शिव हैं, जिनका आकाश-रुप,
‘उदय-नाथ’ पार्वती पृथ्वी-रुप जानिए ।
‘सत्य-नाथ’ ब्रह्मा जी जल-रुप मानिए ,
विष्णु ‘सन्तोष-नाथ’ तिनका है तेज-रुप ।
अचल हैं ‘अचम्भे-नाथ’ जिनका है शेष-रुप,
गज-बली ‘कन्थभ-नाथ’ हस्ति-रुप जानिए ।
ज्ञान-पारखी जो सिद्ध हैं वह ‘चौरंगीनाथ’ ,
अठार भार वनस्पति चन्द्र-रुप जानिए ।
दादा-गुरु ‘श्रीमत्स्येन्द्र-नाथ’ जिनका है माया-रुप ,
गुरु ‘श्रीगोरक्ष-नाथ’ ज्योति-रुप जानिए ।
बाल हैं त्रिलोक, ‘नव-नाथ’ को नमन करुँ,
नाथ जी ये बाल को अपना ही जानिए ।।

३॰ नव-नाथ-चरित

।।दोहा।।
‘आदि-नाथ’ आकाश-सम, सूक्ष्म रुप ॐकार ।
तीन लोक में हो रहा, आपनि जय-जय-कार ।।१
।।चौपाई।
जय-जय-जय कैलाश-निवासी, यो-भूमि उतर-खण्ड-वासी ।
शीश जटा सु-भुजंग विराजै, कानन कुण्डल सुन्दर साजे ।।२
डिमक-डिमक-डिम डमरु बाजे, ताल मृदंग मधुर ध्वनि गाजे ।
ताण्डव नृत्य किया शिव जब ही, चौदह सूत्र प्रकट भे तब ही ।।३
शब्द-शास्त्र का किया प्रकाशा, योग-युक्ति राखे निज पासा ।
भेद तुम्हारा सबसे न्यारा, जाने कोई जानन-हारा ।।४
योगी-जन तुमको अति प्यारे, जरा-मरण के कष्ट निवारे ।
योग प्रकट करने के कारण, ‘गोरक्ष’ स्वरुप किया धारण ।।५
ब्रह्म-विष्णु को योग बताया, नारद ने निज शीश नवाया ।
कहाँ तलक कर वरनूँ गाथा, आदि-अनादि हो आदि-नाथा ।।६
।।दोहा।।
‘उदय-नाथ’ तुम पार्वती, प्राण-नाथ भी आप ।
धरती-रुप सु-जानिए, मिटे त्रिविध भव-ताप ।।७
।।चौपाई।।
जय-जय-जय ‘उदय’-मातृ भवानि, करो कृपा निज बालक जानी ।
पृथ्वी-रुप क्षमा तुम करती, दुर्गा-रुप असुर-भय हरती ।।८
आदि-शक्ति का रुप तुम्हारा, जानत जीव चराचर सारा ।
अन्नपूर्णा बन के जग पाला, धन्यो रुप सुन्दरी बाला ।।९
ब्रह्मा-विष्णु भी शीश नमाएँ, नारद-शारद मिल गुण गाएँ ।
योग-युक्ति में तुम सहकारी, तुझे सदा पूजें नर-नारी ।।१०
योगी-जन पर कृपा तुम्हारी, भक्त-भीड़-भय-भञ्जन-हारी ।
मैं बालक तुम मातृ हमारी, भव-सागर से तुरतहिं तारी ।।११
कृपा करो मो पर महरानी, तुम सम न कोइ दूसर दानी ।
पाठ करै जो ये चित लाई, ‘उदय-नाथ’ जी होंइ सहाई ।।१२
।।दोहा।।
‘सत्य-नाथ’ हैं सृष्टि-पति, जिनका है जल-रुप ।
नमन करत हैं आपको, स-चराचर के भूप ।।१३
।।चौपाई।।
जय-जय-जय ‘सत्य-नाथ’ कृपाला, दया करो हे दीन-दयाला ।
करके कृपा यह सृष्टि रचाई, भाँति-भाँति की वस्तु बनाई ।।१४
चार वेद का किया उचारा, ऋषि-मुनि मिल के किया विचारा ।
सनत् सनन्दन-सनत्कुमारा, नारद-शारद गुण-भण्डारा ।।१५
जग हित सबको प्रकटित कीन्हा, उत्तम ज्ञान योगी-पद दीन्हा ।
पाताले भुवनेश्वर सुन्दर, सत्य-धाम-पथ धाम मनोहर ।।१६
कुरु-क्षेत्रे पृथूदक सुन्दर, ‘सत्य-नाथ’ योगी कहलाए ।
आपन महिमा अगम अपारा, जानत है त्रिभुवन सारा ।।१७
आशा-तृष्णा निकट न आए, माया-ममता दूर नसाए ।
‘सत्य-नाथ’ का जो गुण गाएँ, निश्चय उनका दर्शन पाएँ ।।१८
।।दोहा।।
विष्णु तो ‘सन्तोष-नाथ’, खाँड़ा खड्ग-स्वरुप ।
राज-सम दिव्य तेज है, तीन लोक का भूप ।।१९
।।चौपाई।।
जय-जय-जय श्री स्वर्ग-निवासी, करो कृपा मिटे काम फाँसी ।
सुन्दर रुपे विष्णु-तन धारे, स-चराचर के पालन हारे ।।२०
सब देवन में नाम तुम्हारा, जग-कल्याण-हित लेत अवतारा ।
जग-पालन का काम तुम्हारा, भीड़ पड़े सब देव उबारा ।।२१
योग-युक्ति ‘गोरक्ष’ से लीन्ही, शिव प्रसन्न हो दीक्षा दीन्ही ।
शंख-चक्र-गदा-पद्म-धारी, कान में कुण्डल शुभ-कारी ।।२२
शेषनाग की सेज बिछाई, निज भक्तन के होत सहाई ।
ऋषि-मुनि-जन के काज सँचारे, अधम दुष्ट पापी भी तारे ।।२३
देवासुर-संग्राम छिड़ाए, मार असुर-दल मार भगाए ।
‘सन्तोष-नाथ’ की कृपा पाएँ, जो चित लाय पाठ यह गाएँ ।।२४
।।दोहा।।
शेष रुप है आपका, अचल ‘अचम्भेनाथ’ ।
आदि-नाथ के आप प्रिय, सदा रहें उन साथ ।।२५
।।चौपाई।।
जय-जय-जय योगी अचलेश्वर, सकल सृष्टि धारे शिव ऊपर ।
अकथ अथाह आपकी शक्ति, जानो पावन योग की युक्ति ।।२६
शब्द-शास्त्र के आप नियन्ता, शेषनाग तुम हो भगवन्ता ।
बाल यती है रुप तुम्हारा, निद्रा जीत क्षुधा को मारा ।।२७
नाम तुम्हारा बाल गुन्हाई, टिल्ला शिवपुरी धाम सुहाई ।
सागर मथन की हुइ तैयारी, देव दैत्यकी सेना भारी ।।२८
पर-दुख-भञ्जन पर-हित काजा, नेति आप भये सिद्ध राजा ।
सागर मथा अमृत प्रकटाया, सब देवन को अमर बनाया ।।२९
यतियों में भी नाम तुम्हारा, योगियों में सिद्ध-पद धारा ।
नित ही बाल-स्वरुप सुहाए, अचल अचम्भेनाथ कहाए ।।३०
।।दोहा।।
‘गज-बलि’ गज के रुप हैं, गण-पति ‘कन्थभ-नाथ’ ।
देवों में हैं अग्र-तम, सब ही जोड़ें हाथ ।।३१
।।चौपाई।।
जय-जय-जय श्रीकन्थभ देवा, हो कृपा मैं करूँ नित सेवा ।
मोदक हैं अति तुमको प्यारे, मूषक-वाहन परम सुखारे ।।३२
पहले पूजा करे तुम्हारी, काज होंय शुभ मंगल-कारी ।
कीन्हि परीक्षा जब त्रिपुरारी, देखि चतुरता भये सुखारी ।।३३
ऋद्धि-सिद्धि चरणों की दासी, आप सदा रहते वन-वासी ।
जग हित योगी-भेष बनाये, कन्थभ नाथ सु-नाम धराये ।।३४
कन्थ कोट में आसन कीन्हा, चमत्कार राजा को दीन्हा ।
सात बार तो कोट गिराए, बड़े-बड़े भूपनहिं नमाये ।।३५
वसुनाथ पर कृपा तुम्हारी, करी तपस्या कूप में भारी ।
भैक कापड़ी शिष्य तुम्हारे, करो कृपा हर विघ्न हमारे ।।३६
।।दोहा।।
ज्ञान-पारखी सिद्ध हैं, चन्द्र चौरंगि नाथ ।
जिनका वन-पति रुप है, उन्हें नमाऊँ माथ ।।३७
।।चौपाई।।
जय-जय-जय श्री सिद्ध चौरंगी, योगिन के तुम नित हो संगी ।
शीतल रुप चन्द्र अवतारा, सदा बरसो अमृत की धारा ।।३८
वनस्पति में अंश तुम्हारे, औषधि के सुख भये सुखारे ।
शालिवान है वंश तुम्हारा, बालपने योगी तन धारा ।।३९
अति सुन्दर तव सुन्दरताई, सुन्दरि रानी देख सुभाई ।
गुरु-शरण में रानी आई, हाथ जोड़ यह विनय सुनाई ।।४०
शिष्य आपका मुझे चाहिए, नहीं तो प्राण तन में बहिए ।
सुनकर गुरु जी करुणा कीन्हीं, जब तुझे यही आज्ञा दीन्हीं ।।४१
रानी संग चले मति पाई, जाय महल में ध्यान लगाई ।
रानी ने तब शीश नमाया, हुए अदृश्य भेद नहीं पाया ।।४२
।।दोहा।।
माया-रुपी आप हैं, दादा मछन्द्रनाथ ।
रखूँ चरण में आपके, करो कृपा मम नाथ ।।४३
।।चौपाई।।
जय-जय-जय अलख दया-सागर, मत्स्य में प्रकट जय करुणाकर ।
अमर कथा श्री शिवहिं सुनाई, गौरी के जो मन को भाई ।।४४
सूक्ष्म वेद जो शिवहि सुनाया, गर्भ में आपने वह पाया ।
जाकर अपना शीश नवाया, उमा महेश सु-वचन सुनाया ।।४५
जीव जगत का कर कल्याणा, ले आशीष चले भगवाना ।
सिंहल द्वीप सु-राज चलाया, सारे जग में यश फैलाया ।।४६
कदली-वन में किया निवासा, योग-मार्ग का किया प्रकाशा ।
माया-रुपहि आप सुहाएँ, जग को अन-धन-वस्त्र पुराएँ ।।४७
दादा पद है आपन सुन्दर, करें कृपा निज भक्त जानकर ।
महिमा आपकी महा भारी, कहि न सके मति मन्द हमारी ।।४८
।।दोहा।।
शिव गोरक्ष शिव-रुप हैं, घट-घट जिनका वास ।
ज्योति-रुप में आपने, किया योग प्रकाश ।।४९
।।चौपाई।।
जय-जय-जय गोरक्ष गुरुज्ञानी, तोग-क्रिया के तुम हो स्वामी ।
बालरुप लघु जटा विराजै, भाल चन्द्रमा भस्म तन साजै ।।५०
शिवयोगी अवधूत निरञ्जन, सुर-नर-मुनि सब करते वन्दन ।
चारों युग के आपहि योगी, अजर अमर सुधा-रस भोगी ।।५१
योग-मार्ग का किया प्रचारा, जीव असंख्य अभय कर जारा ।
राजा कोटि निभाने आए, देकर योग सब शिष्य बनाए ।।५२
तुम शिव गोरख राज अविनाशी, गोरक्षक उत्तरापथ-वासी ।
विश्व-व्यापक योग तुम्हारा, ‘नाथ-पन्थ’ शिव-मार्ग उदारा ।।५३
शिव गोरक्ष के शरण जो आएँ, होय अभय अमर-पद पाएँ ।
जो गोरख का ध्यान लगाएँ, जरा-मरण नहिं उसे सताएँ ।।५४
।।दोहा।।
माला यह नव-नाथ की, कण्ठ करे जो कोइ ।
कृपा होय नव-नाथ की, आवागमन न होइ ।।५५
नव-नाथ-माला सु-रची, तुच्छ मती अनुसार ।
त्रुटि क्षमा करें योगि-जन, कर लेना स्वीकार ।।५६
नहिं विद्या में निपुण हूँ, नहिं है ज्ञान विशेष ।
योगी-जन गुरु-पूजा को, करता हूँ आदेश ।।५७
।।पाठ-विधि और फलादेश।।
कर स्नान शुद्ध प्राणायाम करै बैठ कर,
आम पीपल आदि की समिधा जलाइए ।
धूनी की पूजा कर प्रेम सहित, गोकुल धूप करें,
नव-नाथ-माला का पाठ नित्य सुनाइए ।।
एक सौ आठ बार माला पठन करे,
नव-नाथ-माला प्रेम से फिराइए ।
अष्ट-सिद्धि नव-निधि मुक्ता-माल प्राप्त हो,
माला के प्रताप में मोक्ष-फल पाइए ।।
आशा और तृष्णा निकट नहीं आएँगी,
जरा-मरण आधि-व्याधि तुझे न सताएँगी ।
नव-नाथ-माला के पठन-प्रभाव से,
भूत-प्रेत-चोर आदि कभी न डराएँगे ।
बाल ये त्रिलोक नव-नाथ के आशिष से,
होइगी जो इच्छा शीघ्र वही फल पाएँगे ।।

Print

,

Mar
18

श्रीसाबर-शक्ति-पाठ
पूर्व-पीठिका
।। विनियोग ।।

श्रीसाबर-शक्ति-पाठ का, भुजंग-प्रयात है छन्द ।
भारद्वाज शक्ति ऋषि, श्रीमहा-काली काल प्रचण्ड ।।
ॐ क्रीं काली शरण-बीज, है वायु-तत्त्व प्रधान ।
कालि प्रत्यक्ष भोग-मोक्षदा, निश-दिन धरे जो ध्यान ।।
।। ध्यान ।।
मेघ-वर्ण शशि मुकुट में, त्रिनयन पीताम्बर-धारी ।
मुक्त-केशी मद-उन्मत्त सितांगी, शत-दल-कमल-विहारी ।।
गंगाधर ले सर्प हाथ में, सिद्धि हेतु श्री-सन्मुख नाचै ।
निरख ताण्डव छवि हँसत, कालिका ‘वरं ब्रूहि’ उवाचै ।।
।। पाठ-प्रार्थना ।।
जय जय श्रीशिवानन्दनाथ ! भगवम्त भक्त-दुःख-हारी ।
करो स्वीकार साबर-शक्ति-पाठ, हे महा-काल-अवतारी ।।

साबर-शक्ति-पाठ
ॐ नमो जगदम्बा भवानी, करो सिद्ध कारज महरानी ।
त्रिभुवन महिमा तिहारी, जै श्रीजया गगन-विहारी ।।
तेरे भक्त को दुःख न व्यापे, शाक्त से यम-राज भी काँपे ।
हनुमत वीर चले अगुवानी, बाँऐं भैरव है महारानी ।।
पीछे वीरभद्र जब गरजें, दाँऐं नृसिंह वीर हैं हर्षे ।
कलि प्रत्यक्ष प्रभाव तुम्हारा, जो सुमरे दुःख विनसे सारा ।।
रक्त-नैनन से प्रगटी ज्वाला, काँप उठे सुरासुर दिग्-पाला ।
त्राहि-त्राहि भव-दुःख-भञ्जन माता, कर जोर कहें सुर सिद्ध विधाता ।।
जब-जब धर्म पर संकट आया, उठा त्रिशूल सब दुःख मिटाया ।
धर्म सनातन की माँ तुम रक्षक, पामर खल मानव दल भक्षक ।।
भक्ति-पूर्ण हूँ शरण तुम्हारी, जय दुर्गे श्यामा शिव की प्यारी ।।
श्रीरक्त-काली-समर्पणम् ।।१
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रीतारिणी क्लेश-हारिणी, भक्त-रक्षक माँ गगन-विहारिणी ।
कर खप्पर-खड्ग मुण्ड की माला, पाश गदा है भुजा विशाला ।।
मद-भरे नयन त्रिभुवन-जग मोहें, पाँयन सुवरन घुँघरु सोहें ।
राम-रुप तुमने जब धारा, भार भूमि सब असुर सँहारा ।।
जल-संकट-हर्ता बुद्धि की दाता, जय जय श्रीताराम्बा माता ।
वाहन मयूर कर वीणा बाजे, साम-वेद सुन्दर ध्वनि गाजे ।।
रुप कालिका घोर भयंकर, शाक्त जनों को लगता सुन्दर ।
मतवाली हो रण में धावे, दानव-दल तोहि देख घबरावे ।।
वाहन सिंह चढ़ो अब श्यामा, द्वेष-संहार का बजे दमामा ।
उग्र प्यास भैरव की बुझाओ, कला-कोटि नर-मेध रचाओ ।।
उग्र-तारा है नाम तिहारा, धूम-केतु बन प्रगटो तारा ।।
संहार करो कु-सृष्टि को काली, जय जय श्रीदुर्गे डमरु वाली ।।
नहीं आँच तेरे भक्त को आवे, मदान्ध खलों की सत्ता मिट जावे ।
जब भी पाप बढ़ा है जग में, काली-रुप हो मेटा क्षण में ।।
भक्ति-पूर्ण कहता माँ तुझसे, पाप साम्राज्य उठा भू-तल से ।
‘धर्म की जय’ हो गूँजे नारा, अखण्ड वर्ग धर्म रहे तुम्हारा ।।
सत्य की शान्ति ब्रह्मचर्य व्रत, मातृ-बक्ति से रहे सदा रत ।
सहस्त्र-भुजे माँ दुर्ग-नन्दिनी, शिवा शाम्भवी दुष्ट-वर्षिणी ।।
त्रिपुर-मालिनी हे विन्ध्य-वासिनी, भाल कुअंक विधि-लेख-नाशिनी ।
अष्ट-वीर योगिनी मंगल गावें, शक्र तुम्हारा चँवर डुलावें ।।
मणि-द्वीप में राज भवानी, धन्य-धन्य माँ उमा महरानी ।
मुझे जगज्जये ! आशा तेरी, अष्ट-भुजे ! भाग्य बदल दे मेरा ।।
जो सुमरे काली-तारा, पाप-त्रिताप भस्म हो सारा ।
चरण पाताल शीश कैलाशा, रुप विराट तोड़े यम-पाशा ।।
अनन्त रुप युग-युग में धारे, भक्त-जनों के काज सँवारे ।
त्रिभुवन-दानी श्रीनाद-नादिनी, रवि-शत-कोटि-प्रभा-प्रकाशिनी ।।
श्रीतारा-समर्पणम् ।।२
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्री षोडशी षण्मुख-जननि, सदा बसो मम हृदय वर-वर्णिनी ।
हूँ भक्ति-पूर्ण तेरा ही अंशी, वर्द्धित हो यह सत्कुल सद्-वंशी ।।
श्रीयन्त्र-राज-स्मरण की शक्ति, चरण-कमल की माँ दे दो भक्ति ।
चक्र त्रिशूल खड्ग कमल धारे, घन गर्जन कर राक्षस मारे ।।
अरुण वरण पद सुन्दर रुपा, ध्यावत जो नर होय सो भूपा ।
रवि-शशि लज्जित निरख पद-शोभा, सेवे शाक्त हृदय अति लोभा ।।
त्रि-भुवन-सुन्दरी वयस किशोरा, मोहे शिव ज्यों चन्द्र-चकोरा ।
स्तन अमृत-रस-भण्डारा, पीवत होय बुद्दि-बल-भारा ।।
जेहि पर कृपा तुम्हारी होई, स्तन-अमृत पावे सोई ।
करुणा-दृष्टि विलोके जोई, विश्व-विख्यात कवि सो होई ।।
जो भगवती षोडशी को ध्यावे, अक्षय आयुष-यौवन पावे ।
निर्द्वन्द विमल गति मति दाता, जय श्री श्यामे ! त्रिभुवन भाग्य-विधाता ।।
पंकज आभा सुगन्ध शरीरा, श्याम-गात विविध रंग चीरा ।
महीष-मर्द्दिनी अमित बल-शाली, जै-जै सती सिद्दिदा काली ।।
आसव-पान-मत्त अट-पट वाणी, शाक्त-मण्डल को सुख-खानी ।
जल-थल-नभ किलोल करन्ती, जय भद्रकाली माँ मम दुख-हन्त्री ।।
निर्धन सृष्टि-गत जो बालक तोरे, उनके शीघ्र बसा दे डेरे ।
संसार-इच्छुक जिनका मन, दे दो माँ उन्हें स्त्री-सुत-धन ।।
हूँ भक्ति-पूर्ण तेरे चरणों का भौंरा, तुमको नैना देखत चहुँ ओरा ।
भोग-मोह से भक्त यह है न्यारा, मन चाहत तव चरण-अधारा ।।
ब्रह्म-वादिनी ब्रह्म-ज्ञान दे, विमला विमल मति-विज्ञान दे ।
सावित्री सर्व-शोक-दुःख-हर्ता, मम जीवन-धन तू जग-भर्ता ।।
मम मात-पिता गुरु-बन्धु तुम पद्मा, तू गौरी सत्-असत्-रुपा माँ ।
रत्न-द्वीप की तुम महारानी, सिद्धि ऐश्वर्य दो मुझे भवानी ।।
जहाँ जब सुमरुँ प्रकट हो जाओ, उठा त्रिशूल सब विघ्न मिटाओ ।।
अटल छत्र है राज तुम्हारा, जो सुमरे हो भव-सिन्धु के पारा ।।
श्रीषोडशी-समर्पणम् ।।३
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रीभुवनेश्री-परमेश्वरी, श्रीपार्वती माँ राजेश्वरी ।
श्रीकामदा काल-रात्रि एक-वीरा, तेज-स्वरुपिणी दुर्धर्ष-बल-धीरा ।।
ऋण-नाश-कर्त्री श्री-शक्ति तू है, माँ-माँ सुत पुकारे तू किधर है ?
सर्वार्थ-दात्री नाम तेरा जग में, मेरी बार कहाँ भूली हो मग में ।।
पुत्र हो कुपुत्र पर कु-माता न होवे, श्रीगंगा की धारा ज्यों पाप धोवे ।
मैं हूँ तेरा-आशा है सिर्प तेरी, भला या बुरा हूँ-पर माँ हो तुम मेरी ।।
खड्ग-खप्पर-पाश-माला हाथ में, चलता है भैरव तेरे साथ में ।
जिधर भी माँ नजर तूने फिराई, वहाँ ही बटुक जा करता सहाई ।।
शाकम्भरी श्रीपूर्णा गिरि-नन्दिनी, परमार्थ-शीले माँ नित्यानन्दिनी ।
क्षीर-सिन्धु किनारे बजाती हो वेणु, श्रीजयाम्बे तू ही मेरी कामधेनु ।।
दारिद्र-महिषासुर ने है घेरा, उठा त्रिशूल दुर्गे ! क्लेश मेटो मेरा ।
तू ही हरि-हर-विरञ्चि रुप शक्ति, जय श्रीश्यामा दे श्री-कीर्ति-भक्ति ।।
राज-रानी तेरे सिवा कौन दाता, मिटा दे बुरा जो लिखा हो विधाता ।
तेरे ही प्रताप से कुबेर धनेश्वर कहलाया, जयति जै श्री भुवने माया ।।
श्रीभुवनेश्वरी-समर्पणम् ।।४
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रीधूमावती लीला-मयी, कलि प्रत्यक्ष तुम हो माहेश्वरी ।
जो चन्द्र-मण्डल में ध्यान धरते, पा कवित्व मोह-सिन्धु से तरते ।।
षण्मास जो तेरा स्वरुप ध्याता, पुष्प-धन्वी भी उससे हार जाता ।
पद्म-मालाएँ तेरे चरणों में धरता, विश्व-मण्डल का होता वह भर्त्ता ।।
तू ही अनेक रुपों से भासे, जो जान जाये-मृत्यु भी नासे ।
सिद्ध-विद्या तू अमृत-सवरुपी, जिसके हृदय में वही है देव-रुपी ।।
भ्रामरी भद्रिका मंगल-करी, जयन्ती जया तुम दुःख-हरी।
त्रिगुण से परे है धाम तेरा, सदा ही कल्याण करो माँ मेरा ।।
तू ही पूर्णागिरीश्वरी कामेश्वरी, करुणा-मयी हो श्रीराज-राजेश्वरी ।
भूति-विभूति-दात्री श्री सती, भक्तों को देती हो श्री-कीर्ति-गती ।।
दिव्य-दृष्टि सिद्धैश्वर्य-दाता, भक्ति-पूर्ण करुँ मैं प्रणाम माता ।
तेरा ही गुण गाता रहता हूँ शाक्त, दया-मयी चाहता हूँ तेरी भक्ति ।।
बिगाड़ो या बनाओ अधिकार तुमको, न होगा जरा भी मलाल मुझको ।
किश्ती ये कर दी माँ तेरे हवाले, चाहे डुबा दे या चाहे बचा ले ।।
तमन्नओं की धूप देता हूँ तुमको, तेरे नाम से है इश्क मुझको ।
तेरी याद में माँ दिल आँसू बहाता, हठी मुसाफिर राह चलता जाता ।।
पीताम्बरा चाहे जितना सता, कभी-न-कभी पाऊँगा तेरा पता ।
अभयंकरी हे मणि-द्विप-रानी, तेरी सेवा में रत है सिद्ध-ज्ञानी ।।
त्रिशुल खप्पर गले मुण्ड-माला, मुक्त-केशी त्रिनयन है विशाला ।
श्रीखेचरी गन्धर्व-लोक-दात्री, अष्टांग योग-वक्ता तू श्री-विधात्री ।।
पीला कमल-सा चरण तेरा, बना है जीवन का आधार मेरा ।
तेरी लीला श्री तू ही जाने, भक्त तो यथा-शक्ति गुण बखाने ।।
कुलाचार से योगी करते हैं पूजा, तू ही तो ब्रह्म न और दूजा ।
माँ-पुत्र सबसे बड़ा है नाता, पुत्र हो कु-पुत्र-न माता कु-माता ।।
इतना ही बस-मैं जानता हूँ, मानो न मानो-मैं मानता हूँ।
श्रीधूमावती-समर्पणम् ।।५
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रीभैरवी भूतेश्वरी, आनन्द-दाता त्वं ज्ञाने-मातेश्वरी ।
श्री वीर-विद्या चतुर्भुजा सोहे, पात्र नाग शूल पाश शत्रु मोहे ।।
श्मशाने निवासिनी श्यामा दिगम्बरा, माँ भेरवी भक्त-पालन-तत्परा ।
अस्थि-मुण्ड-माल त्रिनेत्र-कराला, चरणों में सोहत गुञ्ज-माला ।।
मद-मत्त हो तुम खिलखिलाती, आ-सेतु पृथ्वी काँप जाती ।
बिगड़ी को बनाता है नाम तेरा, तव पदाम्बुज में लिपटा रहे मन मेरा ।।
संग्राम में जीत पाए, वही, जिस पर माँ ! तेरी छाया रही ।
जो हुआ जग में तेरे सहारे, उसका यम भी क्या बिगाड़े ।।
मृत्युञ्जयी तू हृदय में जिसके, काल भी घबराता है उससे ।
मारकण्डे पर की तूने मेहर, हो गया उसी क्षण माँ ! वो अमर ।।
हनुमान ने जब स्तुति गाई, पा आशिर्वाद जा लंका जलाई ।
मेघनाद ने जब तुझे ध्याया, इन्द्र को जा बाँध लाया ।।
श्रीत्रिपुरा-चक्र-यज्ञ राम ने रचाया, तेरी कृपा से ही रावण मिटाया ।
श्री-तत्त्वागम जो नित्य ध्याता, कलि में वही भोग-मोक्ष पाता ।।
विन्दु-शक्ति शिव पृथ्वी को, भैरव-रुप हो पावे ।
पाप-पुण्य से निर्द्वन्द होवे, नित्यानन्द-पद जावे ।।
चक्र-योग का विषय है, मैथुन पात्र आनन्द ।
जो समझे शिव-रुप वे, नहीं तो पामर-वृन्द ।।
विद्या-साधन अगम है, चलना तलवार की धार ।
गुरु-कृपा से सफलता, वरना टुकड़े होय हजार ।।
दिगम्बरा विपरीत-रति ध्यावे, या हो अमर या नरक में जावे ।
कुल-पथ अमृत-मय धारा, जिसमें कापालिक करें विहारा ।।
भैरवी-भूतनाथ जपता जो नर, मन-वाञ्छित सिद्धि हो सत्वर ।
श्रीमहा-भैरवी-समर्पणम् ।।६
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रीबगलामुखी-स्वरुपा, शत्रु-संहार करो देवि ! अनूपा ।
चरण तेरे कोमल कमल-जैसे, जिसके हृदय में वही देव जैसे ।।
दुःख-शुम्भ ने आ घेरा है मुझको, मिटा क्लेश मैया भक्त कहे तुझको ।
पीताम्बरा श्रीअपराजिता तू कहाई, अभी भक्त सुमरे तू करती सहाई ।।
गदा-चक्र-पाश-शंख हाथों सोहे, चतुर्भुज रुप तेरा शिव को मोहे ।
योग-दीक्षा-हीन को न होता ज्ञान तेरा ।
पूर्णाभिषिक्त भी न जान पाएँ धाम तेरा ।।
जिस पर तेरी कृपा हो वही गुण-गान करता ।
दम्भी तन्त्र-साधक क्लेशित हो के मरता ।।
तेरे अनन्त रुपों ने की भक्त-रक्षा ।
तेरे वीर-भद्र सुत मने मारा था दक्षा ।।
कलि में महिमा-मयि ! व्यर्थ है कर्म सारे ।
भक्ति-पूर्ण हो जै-जै जयाम्बा पुकारे ।।
तम-प्रबल युग में भ्रमित है कर्म-काण्डी ।
शुष्क वेदान्त छाँटे बक-वत् त्रि-दण्डी ।।
वाक्-मनो-काय-निग्रह कोई न करते ।
गृह-सदृश पलँग पर फल-फूल चरते ।।
जिधर देखा उधर ही सभी ब्रह्म-वक्ता ।
उपासना बिन स्वरुप-ज्ञान कैसा ।।
आहार-निद्रा-पटु पृथ्वी-जल-चारी ।
कैसे हो माता सहस्त्रार-विहारी ?
कहते कपिल सहस्त्रार हो आए ।
ईश्वर-सम शक्ति-प्रतिभा को पाए ।।
नाभि-चक्र तक योगी जाता, अष्ट-सिद्धि-गुण प्रगट हो जाता ।
अनाहत-प्रकाश प्रत्यक्ष हो जाए, सहस्त्र-वर्ष आयु वह पाए ।।
मैं तो स्वाधीष्ठान तक आया, अति अद्भुत देखी तेरी माया ।
मान-सरोवर त्रिकोण दिव्य सुन्दर, श्रीधाता-शारदा बैठे हैं कमल पर ।।
भुजंग स्वर्ण-मयी महा-काम-स्वरुपा, नत-मस्तक हो पूजत सुर-भूपा ।
गायत्री प्रकृति श्री-यन्त्र मनोहर, श्रीशुभ्र-ज्योत्स्ने विश्व-मोहन-कर ।।
राज-राजेश्वरी अमित बल-शाली, सर्वार्थ-पूर्ण-करी श्री-हंस-काली ।
श्री दिव्य सिद्ध-धाम गुरु-रुप धरी, जै श्रीबगला शाक्त-मनोरथ पूर्ण करी ।।
जिह्वा पकड़कर गदा उठाए, पाश डाल शत्रु को मिटाए ।
उन्मत्त नेत्र बक-वाहन सुहाए, भक्त-रक्षा हेतु शीघ्र ही धाए ।।
सिद्ध-विद्या श्री स्तम्भनी मंगला, करो त्राण मम भीमा चञ्चला ।
त्र्यक्षरी मन्त्र-मूर्ति माँ माहेश्वरी, कलि-प्रत्यक्ष फलदा तू परमेश्वरी ।।
भुक्ति-मुक्तिदा भक्त-शरण्ये, नमामि भजामि श्रीगिरि-राज-कन्ये !
श्रीचक्र-राज-शक्ति तुम कहाती, विधि का लिखा कु-अक्षर मिटाती ।।
सिद्ध-भक्ति-पूर्ण को है विश्वास तेरा, ब्रह्मास्त्र-मन्त्र-रुप है आधार मेरा ।
लोक-लाज-प्रपञ्च-कर्म त्यागा, श्रीबगला-चरण-कमल मन लागा ।।
श्रीबगलामुखी समर्पणम् ।।७
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ नमो श्रित्रिपुर-सुन्दरी-चरणं, ब्रह्मादि-सेवित दारिद्रय-हरणम् ।
बुद्ध-देव-वन्दित दया-सागरी, वज्र-यान-वर्ग-पूज्या श्रीकामेश्वरी ।।
अमृत-पात्र-पद्म-इक्ष-धनुर्बाण-हस्ता, ताम्बूल-पूरित-मुखी श्रीस्वानन्द-मस्ता ।
तृतीयावरण में बाला कहाई, शरण मैं तेरी-करी माँ सहाई ।।
त्रिपथगा त्रिवर्णाराध्य शक्ति, श्री-सुन्दरी दे पद-कमल-भक्ति ।
क्रम-दीक्षाचार-वर्णित श्रीभवानी, हे कु-रंग नेत्री ! तू सर्व-सुख-दानी ।।
पद्मावती सर्वाकर्षिणी कुरुकुल्ला, देखता हूँ तू ही है अहिल्या ।
कामेश्वर-प्रिया आद्या श्री-प्रसूता, पालन करती है तू विश्व-भूता ।।
श्रीशताक्षरी दिव्य-कादि-हादि-मूर्ति, रहस्यार्थ-पूर्णे ! तुम हो सर्व-पूर्ति ।
अभिनव गुप्त सु-पूजित माहेश्वरी, सिद्ध नागार्जुन-वन्दय वागेश्वरी ।।
धाता हरि रुद्र शासन-करी, जयति जय श्रीअभयंकरी ।
पञ्च-प्रेतासन-आरुढ़ा तू अम्बा, बिन्दु-मालिनी जय-जय सिद्धाम्बा ।।
कर्पूर-गौर-वर्णा श्रीकाकिनी, श्रीचक्रेश्वरी मदनातुरा लाकिनी ।
श्रीललिता लक्ष्मी काम-बीज-रुपा, करे प्रदक्षिणा ऋषि-देव-यक्ष-भूपा ।।
राज-राजेश्वरि तू ही अनन्पूर्णा, श्रीपीठाधीश्वरी सर्वाभीष्ट-तूर्णा ।
अर्बुदाचल में अम्बिका कहाई, अष्ट-भुजा सिंह-वाहना कहाई ।।
नील-वस्त्र-धारी सु-कुमारी, जयति जयाज्ञा-चक्र-विहारी ।
अनंग-मेखला है तेरा नाम, श्रीचक्र-राज प्रतिबिम्ब-मय धाम ।।
तू धरा धैर्य धर्म कर्म स्मृति, भक्तों को देती भोग औ सद्-गति ।
देखे चरण तेरे परमेश्वरी, हो गया तभी मुक्त श्रीमाहेश्वरी ।।
पञ्चानन-प्रिया दुर्गमार्थ-दात्री, दुर्गतोद्धारिणी तुम हो विधात्री ।
वारुणी-प्रिया मद-मत्त-हासिनी, जय हेम-कूट-शिखरे विलासिनी ।।
चन्द्र-बिम्बे प्रभा तू चतुर्वग-फलदा, एक-वीरा अपर्णा श्रीकामदा ।
महा-विद्या स्वम्भू श्रीसुधा, त्रिभुवन-वशंकरी हे रत्न-सुविधा ।।
माया-नृत्य-प्रवीणा गंगे-नर्मदे, तू ही है सरस्वती विप्र-वरदे ।
काव्य-छन्द-गति ऋद्धि सन्मति, शाक्त-सेवित श्रीवामा त्रिमूर्ति ।।
रत्न-हार-भूषित नित्य यौवन-जया, भक्त को सदा दो अभय विजया ।
मधुमती-कला श्रीपार्वती सती, रहूँ तेरे प्रताप से मैं सत्य-व्रती ।।
निर्मला राधिका तू ही कालिका, है तेरा ही रुप तो हर-बालिका ।
कभी न विचलित हो मति मेरी, रहे सदा मुझ पर कृपा-दृष्टि तेरी ।।
श्रीत्रिपुराम्बा समर्पणम् ।।८

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नमो देवी ! मातंगी-पादारविन्दा, रक्ष-यक्ष-सेवित महा कवीन्द्रा ।
चतुर्भुजा-चण्ड-क्लेश-पाप-हन्त्री, भक्त-जनों की सदा जय-करन्ति ।।
शुक-क्रीड़ा-मग्न स्मित-मुखी, शीघ्र तेरा भक्त होता सुखी ।
चतुविंशति-दल पर करे निवासा, धरे ध्यान होते छिन्न सभी पाशा ।।
नाद-गर्भा नारायण-पूजिता शुभा, मंगला भद्रा भक्त-कल्प-सुधा ।
रामेश्वरी रुद्र-प्रिया श्रीरागिनी, स्वर्ण-द्युति-कुञ्जिका विन्ध्य-वासिनी ।।
हेम-वज्र-माला-धारिणी श्रीरति, तेरे प्रताप से होऊँ पृथ्वी-पति ।
संग्राम-क्षेत्र में तू रमा करती, प्रगट हो भक्तों के संकट हरती ।।
शार्दूल-वाहना गले शंख-माला, प्रज्वलित-नेत्रा पीती हो हाला ।
गन्धर्व-बालाएँ करती गुण-गान, तेरे रहे सहायक सर्वदा माँ मेरे ।।
सूर्य-चन्द्र-वह्नि-रुप नेत्र तेरे, रहे सहायक सर्वदा माँ मेरे ।
जब भी सुमरुँ हरो कष्ट मेरा, श्री जयाम्बे मुझे तो आधार तेरा ।।
हे नाग-लोक-पूज्या प्राण-दाता, भक्यि-पूर्वक करता नमस्कार माता ।
श्रीमहा-मातंगी समर्पणम् ।।९
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ॐ विष्णु-प्रिया दिग्दलस्था नमो, विश्वाधार-जननि कमलायै नमो ।
बीजाक्षरों की तुम्हीं सृष्टि करती, चरण-शरण भक्त के क्लेश हरती ।।
सिन्धु-कन्या माया-बीज-काया, मोह-पाश से जग को भ्रमाया ।
योगी भी हुए नहैं हैरान तुमसे, कराओ अन्तर्बहिर्याग नित्य मुझसे ।।
न करता हूँ जाप-पूजा मैं तेरी, इतना ही जानता हूँ माँ तू मेरी ।
पद्म-चक्र-शंख-मधु-पात्र धारे, विकट वीर योद्धा तूने सँहारे ।।
श्रीअपराजिता वैष्णवी नाम तेरा, माँ एकाक्षरी तू आधार मेरा ।
तू ही गुरु-गोविन्द करुणा-मयी, जै जै श्रीशिवानन्दनाथ-लीला-मयी ।।
ऐरावत है शुण्डाभिषेक करते, दे प्रत्यक्ष दरशन हे विश्व-भर्ते ।
योग-भोगदा रमा विष्णु-रुपा, मेरी कामधेनु काम-स्वरुपा ।।
सिद्धैशवर्य-दात्री हे शेष-शायी, करे दास बिनती करो माँ सहाई ।
पद्मा चञ्चला श्रीलक्ष्मी कहाई, पीताम्बरा तू गरुड़-वाहना सुहाई ।।
त्रिलोक-मोहन-करी कामिनी, जयति जय श्रीहरि-भामिनी ।
रुक्मिणी राज्ञी अर्थ-क्लेश-त्राता, जय श्रीधन-दात्री विश्व-माता ।।
महा-लक्ष्मी लक्ष्मणा श्यामलांगी, पद्म-गन्धा श्री श्रीकोमलांगी ।
कालिन्दी कमले कर्म-दोष-हन्त्री, सुदर्शनीया ग्रीवा में माला वैजन्ती ।।
श्रीमहा-लक्ष्मी कमला समर्पणम् ।।१०
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गदा-खड्ग-खेट-खप्पर-नाग-चक्र-शूल-शंख-पात्र हाथों में सोहे ।
जय महिषासुर-मर्दिनि चण्डिके, अष्टादश-भुजे विश्वम्भर-मन मोहे ।।
शाकम्भरी दुर्गा दुर्गमा कहलाती, भक्त-रक्षा हित प्रगट तू हो जाती ।
अमृत-दायिनी श्रीश्यामा सहोदरी, विद्युत्प्रभे तू सर्वार्थ-पूर्ण-करी ।।
श्रीइन्द्राक्षी मणि-द्वीपे राज-रानी, जयति जय त्रिभुवन-विख्यात दानी ।
सर्व-मुद्रा-मयी खेचरी भूचरी, कुलजा कौलनी माधवी चाचरी ।।
अगोचरी हो तुम कुल-कमलिनी, सहस्त्रार-शक्ति अर्द्ध-नारीश्वरी ।
इच्छा-क्रिया-ज्ञान-मूर्ति मातेश्वरी, श्रीविद्या तत्त्व-माता परमेश्वरी ।।
भवानी भग-मालिनी हेम-गर्भा परा, सदसत अद्वैत-जननि ऋतम्भरा ।
अहंकार-प्रकृति-स्व-स्वरुप-यजना, ब्रह्म-जननि वेद-माता गगन-वसना ।।
चतुष्षष्टि-तन्त्रागम-यामला, इनसे भी परे हो तुम चित्-कला ।
मातृका वह्निरन्तर्याग-माया, सिद्ध-सनकादि ने भी न भेद पाया ।।
चक्र-वेध से भी परे है धाम तेरा, नम्र-दिव्य-भावी हृदय में वास तेरा ।
मैं दीन भक्त तुम्हें कैसे मनाऊँ, दे चरण-भक्ति सदा गुण गाऊँ ।।
श्रीविन्ध्येश्वरी अजा वर-वर्णिनी, तैजस-तत्त्व-शयामे तू अति गर्विणी ।
आद्या अम्बिका तू है श्रीसुन्दरी, चन्द्र-भगिनी हेम-वदना किन्नरी ।।
तू ही तू है माँ व्याप्त जग में, सर्वत्र तुमको ही देखता हूँ मग में ।
पाप-पुण्य से परे मैं हूँ तेरा, श्रीजयाम्बे मां ! तू मेरी मैं तेरा ।।
महा-काल के वचन से भूतल पर आया, तु शरीरी मैं हूँ तेरी छाया ।
तेरे ही बल से साबरी छन्द कहता, सर्व-शक्ति-दायी शत्रु-वंश-हन्ता ।।
तीन मास ध्यावे दर्शन पावे, वाद-सम्वाद में सुर-गुरु को हरावे ।
साबरी-शक्ति-पाठ-वशी सुरेशा, सर्व-सिद्धि पावे साक्षी हो महेशा ।।
त्रिवर्ण के ही लिए साबरी यह, म्लेच्छ जो पढ़े तो निर्वश हो वह ।
साबरी अधीन है वीर हनुमान, उठो-उठो सिया-राम की आन ।।
अञ्जनि-सुत सुग्रीव के संगी, करो काम मेरा वीर बजरंगी ।
तीन रात्रि में सिद्ध कर कामा, शपथ तोहे रघुपति की बल-धामा ।।
अष्ट-भैरव रक्षण करे तन का, वीरभद्र विकास करे मन का ।
नृसिंह वीर ! मम नेत्रों में रहना, जहाँ पुकारुँ सम्मोहित करना ।।
सिद्ध साबरी है श्यामा का बाण, रुद्र-पाठ हरे शत्रु का प्राण ।
निशा साबरी श्मशान में गावे, नक्षत्र-पाठ जाग्रत हो जावे ।।
वर्ष एक जो पढ़े तट गंगा, अर्द्ध-रात्रि में होकर असंगा ।
ताके संग रहें भैरव-नाथा, राजा-प्रजा झुकावें माथा ।।
बारा वर्ष रटे साबरी हो ज्ञानी, सदा संग में रहें भवानी ।
हो इच्छा-जीवी यो-गति-ज्ञाना, निष्प्रयास प्राप्त हों सकल विज्ञाना ।।
कहे सिद्धि-राज भक्त सुनो माँ काली ! शाबरी-शक्ति तुम्हीं हो कराली ।
शाबरी-पाठ निन्दा जो करे, होय निर्वश तन कीड़े पड़े ।।
शाक्त-रक्षिणी मम शत्रु-भक्षिणी, श्रीरक्त-कालि ! तव भय-दुःख-हरिणी ।
सिद्धि-भक्त यह चरणों में तेरे, ‘कल्याण करो मम’ बार-बार टेरे ।।
श्री चण्डी समर्पणम् ।।११
।।श्रीसाबर-शक्ति-पाठं सम्पूर्णं, शुभं भुयात्।।

उक्त श्री ‘साबर-शक्ति-पाठ‘ के रचियता ‘अनन्त-श्रीविभूषित-श्रीदिव्येश्वर योगिराज’ श्री शक्तिदत्त शिवेन्द्राचार्य नामक कोई महात्मा रहे है। उनके उक्त पाठ की प्रत्येक पंक्ति रहस्य-मयी है। पूर्ण श्रद्धा-सहित पाठ करने वाले को सफलता निश्चित रुप से मिलती है, ऐसी मान्यता है।
किसी कामना से इस पाठ का प्रयोग करने से पहले तीन रात्रियों में लगातार इस पाठ की १११ आवृत्तियाँ ‘अखण्ड-दीप-ज्योति’ के समक्ष बैठकर कर लेनी चाहिए। तदनन्तर निम्न प्रयोग-विधि के अनुसार निर्दिष्ट संख्या में निर्दिष्ट काल में अभीष्ट कामना की सिद्धि मिल सकेगी।
प्रयोग-विधिः-
१॰ लक्ष्मी-प्राप्ति हेतु
नैऋत्य-मुख बैठकर दो पाठ नित्य करें।
२॰ सन्तान-सुख-प्राप्ति हेतु
पश्चिम-मुख बैठकर पाँच पाठ तीन मास तक करें।
३॰ शत्रु-बाधा-निवारण हेतु
उत्तर-मुख बैठकर तीन दिन सांय-काल ग्यारह पाठ करें।
४॰ विद्या-प्राप्ति एवं परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु
पूर्व-मुख बैठकर तीन मास तक ३ पाठ करें।
५॰ घोर आपत्ति और राज-दण्ड-भय को दूर करने के लिए
मध्य-रात्रि में नौ दिनों तक २१ पाठ करें।
६॰ असाध्य रोग को दूर करने के लिए
सोमवार को एक पाठ, मंगलवार को ३, शुक्रवार को २ तथा शनिवार को ९ पाठ करें।
७॰ नौकरी में उन्नति और व्यापार में लाभ पाने के लिए
एक पाठ सुबह तथा दो पाठ रात्रि में एक मास तक करें।
८॰ देवता के साक्षात्कार के लिए
चतुर्दशी के दिन रात्रि में सुगन्धित धूप एवं अखण्ड दीप के सहित १०० पाठ करें।
९॰ स्वप्न में प्रश्नोत्तर, भविष्य जानने के लिए
रात्रि में उत्तर-मुख बैठकर ९ पाठ करने से उसी रात्रि में स्वप्न में उत्तर मिलेगा।
१०॰ विपरीत ग्रह-दशा और दैवी-विघ्न की निवृत्ति हेतु
नित्य एक पाठ सदा श्रद्धा से करें।

Print

,

Mar
18

श्रीसूक्त के प्रयोग
१॰ “श्रीं ह्रीं क्लीं।।हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं”

सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे।
इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है।
इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है।
२॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।”

यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह′ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इस प्रयोग से धन-धान्य, ऐश्वर्य, समृद्धि, वचन-सिद्धि प्राप्त होती है।
३॰ “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं”

सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे।

४॰ “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं”

उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है।
खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है।

५॰ “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।”

उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है।

६॰ “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं”

उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

७॰ “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।”

उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है।
इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

८॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।”

उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे।
इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।

९॰ “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ वद-वद।।”

उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है-
“अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्।
देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।”

इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है।

१०॰ “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि”

देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’- इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।”
प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है।

११॰ “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।”

उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए।

१२॰ “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे। ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं।।”

उक्त मन्त्र का बत्तीस लाख बीस हजार जप करे। “ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य ‘उपैतु मां॰’ मन्त्रस्य कुबेर ऋषिः, मणि-मालिनी लक्ष्मीः देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीं ब्लूं क्लीं बीजानि ममाभीष्ट-कामना-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार ‘विनियोग’, ऋष्यादि-न्यास’ कर ‘आं ह्रीं क्रों ऐं श्रीं आं ह्रं क्रौं ऐं’ इन ९ बीजों से कर-न्यास एवं ‘हृदयादि-न्यास’ करे। ध्यान- “राज-राजेश्वरीं लक्ष्मीं, वरदां मणि-मालिनीं। देवीं देव-प्रियां कीर्ति, वन्दे काम्यार्थ-सिद्धये।।”
मणि-मालिनी लक्ष्मी देवी की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर, बिल्व-पत्र, दूर्वा, हल्दी, अक्षत, मोती, केवड़ा, चन्दन, पुष्प आदि से पूजन करे। ‘श्री-ललिता-सहस्त्रनाम-स्तोत्र’ के प्रत्येक नाम के साथ ‘श्रीं’ बीज लगाकर पूजन करे। सन्ध्यादि नित्य कर्म कर प्रयोग का प्रारम्भ करे। घी का दीप और गूगल का धूप करे। द्राक्षा, खजूर, केले, ईख, शहद, घी, दाड़िम, केरी, नारियल आदि जो प्राप्त हो, नैवेद्य में दे। प्रातः और मध्याह्न में १००० और रात्रि में २००० नित्य जप करे। ढाई साल में एक व्यक्ति बत्तीस लाख बीस हजार का जप पूर्ण कर सकता है। जप करने के लिए प्रवाल की माला ले। जप पूर्ण होने पर अपामार्ग की समिधा, धृत, खीर से दशांश होम कर मार्जन और ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से कुबेर आदि देव साक्षात् या स्वप्न में दर्शन देते हैं और धन, सुवर्ण, रत्न, रसायन, औषधि, दिव्याञ्जन आदि देते हैं।

१३॰ “ॐ ऐं ॐ सौः। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। ॐ ऐं ॐ सौः”

उक्त मन्त्र का ३२,००० जप करे। प्रतिदिन रात्रि में वीरासन में बैठकर ३००० जप करे। ‘अग्नि-होत्र-कुण्ड’ के सम्मुख बैठकर ‘जप’ करने से विशेष फल मिलता है। रुद्राक्ष की माला से जप करे। तिल, गुड़ और घी से दशांश होम तथा तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करावे। ध्यान- “खड्गं स-वात-चक्रं च, कमलं वरमेव च। करैश्चतुर्भिर्विभ्राणां, ध्याये चंद्राननां श्रियम्।।”
एक अनुष्ठान दस दिन में पूर्ण होगा। इस प्रकार चार अनुष्ठान पूरे करें।
इस प्रयोग से शत्रु का या बिना कारण हानि पहुँचानेवाले का नाश होगा और दरिद्रता, निर्धनता, रोग, भय आदि नष्ट होकर प्रयोग करने वाला अपने कुटुम्ब के साथ दीर्घायुषी और ऐश्वर्यवान् होता है। ग्रह-दोषों का अनिष्ट फल, कारण और क्षुद्र तत्वों की पीड़ा आदि नष्ट होकर भाग्योदय होता है।

१४॰ “रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहं। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।”

उक्त मन्त्र का १००० जप रात्रि में करे। २०००० जप होने पर दशांश होम-काले तिल, सुपाड़ी, राई से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। शत्रु के विनाश के लिए, रोगों की शान्ति के लिए और विपत्तियों के निवारण के लिए यह उत्तम प्रयोग है। शत्रु-नाश के लिए रीठे के बीज की माला से काले ऊन के आसन पर वीरासन-मुद्रा से बैठकर क्रोध-मुद्रा में जप करे।

१५॰ “ॐ सौः ॐ हंसः। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ सौः ॐ हंसः।।”

उक्त मन्त्र का एक लाख साठ हजार जप करे। कमल-गट्टे की माला से कमल के आसन पर या कौशेय वस्त्र के आसन पर बैठकर जप करे। ‘स्थण्डिल′ पर केसर, कस्तुरी, चन्दन, कपूर आदि सुगन्धित द्रव्य रखकर श्रीलक्ष्मी देवी की मूर्ति की पूजा करे। जप पूर्ण होने पर खीर, कमल-पुष्प और तील से दशांश होम कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से धन-धान्य, समृद्धि, सोना-चाँदी, रत्न आदि मिलते हैं और सम्पन्न महानुभावों से बड़ा मान मिलता है।

१६॰ “ॐ हंसः ॐ आं। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रुपममन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ हंसः ॐ आं।।”

उक्त मन्त्र ८ लाख जपे। ‘ऐं-लं-वं-श्रीं’- को मन्त्र के साथ जोड़कर न्यास करे। यथा-
कर-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि मध्यमाभ्यां वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां अनामिकाभ्यां हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः हृदयाय नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं शिरसे स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि शिखायै वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां कवचाय हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि नेत्र-त्रयाय वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः अस्त्राय फट्।
ध्यानः- तां ध्यायेत् सत्य-संकल्पां, लक्ष्मीं क्षीरोदन-प्रियाम्।
ख्यातां सर्वेषु भूतेषु, तत्तद् ज्ञान-बल-प्रदाम्।।

उक्त धऽयतान करे। बिल्व फल, बिल्व-काष्ठ, पलाश की समिधा, घृत, तिल, शक्कर आदि से दशांश हवन कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है और धन-धान्य, समृद्धि, वैभव-विलास बढ़ते हैं।

१७॰ “ॐ आं ॐ ह्रीं। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। ॐ आं ॐ ह्रीं।”
उक्त मन्त्र का ३२ लाख जप करे। मन्त्र के साथ ‘वं श्रीं’ बीज जोड़कर न्यास करे।
“स-वत्सा गौरिव प्रीता, कर्दमेन यथेन्दिरा। कल्याणी मद्-गृहे नित्यं, निवसेत् पद्म-मालिनी।।”

उक्त ध्यान करे। जीवित बछड़ेवाली गाय का और पुत्रवती, सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करे। गो-शाला में बैठकर कमल-गट्टे की माला से जप करे। प्रतिदिन छोटे बच्चों को दूध पिलाए। जप पूर्ण होने पर दशांश होम, मार्जन, ब्रह्म-भोजन आदि करे।
इस प्रयोग से वन्ध्या स्त्री को भाग्य-शाली पुत्र होता है। वंश-वृद्धि होती है। होम शिव-लिंगी के बीज, खीर, श्वेत तिल, दूर्वा, घी से करे। तर्पण व मार्जन दूध से करे।

१८॰ “ॐ क्रौं ॐ क्लीं। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलाङ पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवहम्।। ॐ क्रौं ॐ क्लीं”

उक्त मन्त्र प्रतिदिन ३००० जप करे। शुक्ल-पक्ष की पञ्चमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक जप करे। फिर दूसरे मास में शुक्ल पञ्चमी से पूर्णिमा तक जप करे। सम्भव हो, तो चन्द्र-मण्डल के सामने दृष्टि स्थिर रखकर जप करे। अथवा चन्द्रमा का प्रकाश अपने शरीर पर पड़ सके इस प्रकार बैठकर जप करे। रुद्राक्ष, कमल-गट्टे की माला से कौशेय वस्त्र या कमल-पुष्प-गर्भित आसन पर बैठकर जप करे। प्रयोग सोलह मास का है। ध्यान इस प्रकार करे-
“तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणिम्। मैत्यादि-वृत्तिभिश्चार्द्रां, विराजत्-करुणा श्रियम्।।
दयार्द्रां वेत्र-हस्तां च, व्रत-दण्ड-स्वरुपिणिम्। पिंगलाभां प्रसन्नास्यां पद्म-माला-धरां तथा।।
चन्द्रास्यां चन्द्र-रुपां च, चन्द्रां चन्द्रधरां तथा। हिरन्मयीं महा-लक्ष्मीमृचभेतां जपेन्निशि।।

मन्त्र के अक्षर से विनियोग, ऋष्यादि-न्यास कर चन्द्र-मण्डल में भगवती का उक्त ध्यान कर सोलह मास का प्रयोग करना हो, तो शुक्ल पञ्चमी से प्रारम्भ करे। होम खीर, समिधा, कमल पुष्प, सफेद तिल, घृत, शहद आदि से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से वचन-सिद्धि, प्रतिष्ठा, वैभव की प्राप्ति होती है।

१९॰ “ॐ क्लीं ॐ। श्रीं आर्द्रां यः करिणीं यष्टि-सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो न आवह।। ॐ क्लीं ॐ”

उक्त मन्त्र के अनुष्ठान में तीन लाख साठ हजार जप करना होता है। तालाब के किनारे अथवा कमल पुष्पों के आसन पर बैठकर, कमल-गट्टे या स्वर्ण की माला में प्रति-दिन तीन हजार जप है। १२० दिन में प्रयोग पूर्ण होगा। खीर, कमल-पुष्प या घी आदि से दशांश होम करे। १०० सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराए और वस्त्र-भूषण, दक्षिणा दे। ध्यान निम्न प्रकार करे-
तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणीं। रुक्माभां स्वप्न-धी-गम्यां, सुवर्णां स्वर्ण-मालिनी।।
सूर्यामैश्वर्य-रुपां च, सावित्रीं सूर्य-रुपिणीम्। आत्म-संज्ञां च चिद्रुपां, ज्ञान-दृष्टि-स्वरुपिणीं।
चक्षुः-प्राशदां चैव, हिरण्य-प्रचुरां तथा। स्वर्णात्मनाऽऽविर्भूतां च, जातवेदो म आवह।।
इस प्रयोग से ग्रहों की पीड़ा, ग्रह-बाधा-निवृत्ति होकर भाग्य का उदय होता है। अपना और अपने कुटुम्बियों के शरीर नीरोगी, दीर्घायुषी और प्रभावशाली होते हैं। जिससे मिलने की इच्छा हो, वह मनुष्य आ मिलता है।

२०॰ “ॐ श्रीं ॐ हूं। तां म आवह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो, दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहं।। ॐ श्रीं ॐ हूं”
‘ॐ अस्य श्री-पञ्च-दश-मन्त्र ऋचः कुबेरो ऋषिः, भूत-धात्री लक्ष्मी देवता, प्रस्तार-पंक्तिश्छन्दः, ह्रीं श्रीं ह्रीं इति बीजानि, ममाभीष्ट-फल-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार विनियोग कर ऋष्यादि-न्यास करे। ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं’ यर बीज लगाकर अंग-न्यास तथा हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करें-
ध्याये लक्ष्मीं प्रहसित-मुखीं राज-सिंहासनस्थां। मुद्रा-शक्ति-सकल-विनुतां सर्व-संसेव्यनाम्।
अग्नौ पूज्यामखिल-जननीं हेम-वर्णां हिरण्यां। भाग्योपेतां भुवन-सुखदां भार्गवीं भुत-धात्रीम्।।

ज्वारी अथवा गेहूँ की राशि के ऊपर रतेशमी आसन बिछाकर, कमल-बीज की माला से नित्य तीन हजार जप करे। कुल सवा लाख जप करे। जप पूर्ण होने पर दूर्वा, खीर, मधु, घृत आदि से दशांश होम, तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से लक्ष्मी स्थिर रहती है।

 

सामान्य अनुष्ठान विधि
१॰ संकल्पः- ‘॰॰॰मम दुःख-दारिद्रय-भय-शोकादि-अलक्ष्मी-विनिवृत्ति-पूर्वक सुख-सौभाग्य-सम्पत्ति-विधिधैश्वर्य-प्राप्त्यर्थं ऋग्वेदान्तर्गत पञ्च-दशर्चस्य श्रीसूक्तस्य अमुक श्लोकस्य अमुक संख्यावृत्ति जपाख्यं कर्म करिष्ये।’
२॰ विनियोगः- ॐ हिरण्य-वर्णामिति पञ्च-दशर्चस्य श्रीसूक्तस्य अमुक-मन्त्रस्य श्रीरानन्दकर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषयः, श्रीः देवता, अमुक छन्दः, श्रीं बीज, श्रीं शक्तिः, ह्रीं कीलकं, अलक्ष्मी-परिहारार्थं लक्ष्मी-प्राप्त्यै च विनियोगः।
३॰ ऋष्यादि-न्यासः- श्रीरानन्दकर्दम-चिक्लीतेन्दिरा-सुता ऋषिभ्यो नमः शिरसि। श्री-देवतायै नमः हृदि। अमुक छन्दसे नमः मुखे। श्रीः शक्त्यै नमः नाभौ। ह्रीं-कीलकाय नमः पादयोः। अलक्ष्मी-परिहारार्थं लक्ष्मी-प्राप्त्यै च विनियोगाय नमः सर्वांगे।
‘श्रीसूक्त’ के छन्द के विषय में उल्लेखनीय है कि प्रथम तीन ऋचाओं तथा सातवीं से १४वीं ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप् है। चौथी ऋचा का छन्द ‘त्रिष्टुप’ है। ५वीं ऋचा का छन्द ‘प्रस्तार-पंक्ति’ है।
४॰ कर-न्यासः- ॐ हिरण्य-वर्णा अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ हरिणी तर्जनीभ्यां स्वाहा। ॐ सुवर्ण-रजत-स्रजां मध्यमाभ्यां वषट्। ॐ चन्द्रां हिरण्मयीं अनामिकाभ्यां हुं। ॐ लक्ष्मीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ॐ जातवेदो म आवह करतल-करपृष्ठाभ्यां फट्।
५॰ अंग-न्यासः- ॐ हिरण्य-वर्णा हृदयाय नमः। ॐ हरिणी शिरसे स्वाहा। ॐ सुवर्ण-रजत-स्रजां शिखायै वषट्। ॐ चन्द्रां हिरण्मयीं कवचाय हुं। ॐ लक्ष्मीं नेत्र-त्रयाय वौषट्। ॐ जातवेदो म आवह अस्त्राय फट्।
६॰ ध्यानः- “अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः-पुञ्ज-वर्णा, कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः।।
७॰ मानस-पूजन, ८॰ जप, ९॰ हवन, १०॰ क्षमा-प्रार्थना और विसर्जन।

Print

, ,

Mar
18

रुद्र-यामलोक्त श्रीदुर्गा-पञ्जर-स्तवम्
विनियोगः- अस्य श्रीदुर्गा-पञ्जर-स्तोत्रस्य श्रीमहा-मार्तण्ड-भैरवः ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, श्रीपराऽम्बिका दुर्गा देवता, दुं बीजं, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकं, सर्वार्थ-साधने पाठे विनियोगः।
ध्यान्-
हेम-प्रख्यामिन्दु-खण्डात्त-मौलिं, शंखाभीष्टाभीति-हस्तां त्रिनेत्राम्।
हेमाब्जस्थां पीत-वस्त्रां प्रसन्नां, देवीं दुर्गां दिव्य-रुपां नमामि ।।

।। श्रीमार्कण्डेय उवाच ।।
ॐ दुर्गे ! दुर्ग-प्रदेशेषु, दुर्वार-रिपु-मर्दिनी । मर्दयित्री रिपु श्रीणां, दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।१
पथि देवालये दुर्गे, अरण्ये पर्वते जले । सर्वत्रोपगते दुर्गे ! दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।२
दुःस्वप्न-दर्शने घोरे, घोरे निष्पन्न-बन्धने । महोत्पाते च नरके, दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।३
व्याघ्रोरग-वराहाग्नि, निर्ह्रादि-जन संकटे । ब्रह्म-विष्णु-स्तुते, दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।४
खेचरा मातरः सर्वे, भुचराश्चाति-रोहिताः । एते समाश्रितास्तां त्वं, दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।५
कंसासुर-पुरे घोरे, कृष्ण-रक्षण-कारिणी । रक्ष-रक्षा सदा दुर्गे ! दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।६
अनिरुद्धस्य रुद्धस्य, दुर्गे ! वाण-पुरे पुरा । वरदे ! त्वं महा-घोरे, दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।७
देव-द्वारे नदी-तीरे, राज-द्वारे च संकटे । पर्वतारोहणे दुर्गे ! दुर्गे ! रक्ष नमोऽस्तु ते ।।८
दुर्गा-पञ्जरमेतत्तु, भुक्ति-मुक्ति-प्रदायकः । पठतस्तारयेद् दुर्गा, नात्र कार्या विचारणा ।।९
रुद्र-ज्वाला महा-देवि, क्षमा च अखिलेश्वरी । अनन्ता विजया नित्या, मातस्तमपराजिता ।।१०

Print

, , , ,

Mar
17

भगवती मंगल-चण्डिका
‘चण्डी’ शब्द का प्रयोग ‘दक्षा’ (चतुरा) के अर्थ में होता है और ‘मंगल′ शब्द कल्याण का वाचक है। जो मंगल-कल्याण करने में दक्ष हो, वही “मंगल-चण्डिका” कही जाती है। ‘दुर्गा’ के अर्थ में भी चण्डी शब्द का प्रयोग होता है और मंगल शब्द भूमि-पुत्र मंगल के अर्थ में भी आता है। अतः जो मंगल की अभीष्ट देवी है, उन देवी को ‘मंगल-चण्डिका’ कहा गया है।
मनुवंश में ‘मंगल′ नामक राजा थे। सप्त-द्वीपवती पृथ्वी उनके शासन में थी। उन्होंने इन देवी को अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिए भी ये ‘मंगल-चण्डी’ नाम से विख्यात हुई। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी ‘दुर्गा’ कहलाती हैं, उन्हीं का यह रुपान्तर है। ये देवी कृपा की मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियों की ये इष्टदेवी हैं।

मंगल-चण्डिका-स्तोत्रम्
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। ऐं क्रू फट् स्वाहा।।” (२१ अक्षर)
(देवीभागवत, नवम स्कन्ध, अध्याय ४७ के अनुसार मन्त्र इस प्रकार हैः- “ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा।।”)
ध्यानः-
देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम्। सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं मनोहराम् ।।१
श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ।।२
बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् । विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ।।३
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् । जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ।।४
संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे।।५
देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने । प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः ।।
सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चण्डिका सदा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली मंगल-चण्डिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।

।।शंकर उवाच।।
रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचण्डिके । हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके ।।
हर्ष-मंगल-दक्षे च हर्ष-मंगल-चण्डिके । शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके ।।
मंगले मंगलार्हे च सर्व-मंगल-मंगले । सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ।।
पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते । पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ।।
मंगलाधिष्ठातृदेवि मंगलानां च मंगले । संसार-मंगलाधारे मोक्ष-मंगल-दायिनी ।।
सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् । प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे ।।
स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मंगलचण्डिकाम् । प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ।।
देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः । तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत् तदमंगलम् ।।
(ब्रह-वैवर्त्त-पुराण । प्रकृतिखण्ड । ४४ । २०-३६)
महादेवजी ने कहाः- ‘जगन्माता भगवती मंगल-चण्डिके ! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके ! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चण्डिका, मंगला, मंगलार्हा तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो। देवि ! साधु-पुरुषों को मंगल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मंगल का आश्रय हो। देवि ! तुम मंगलग्रह की इष्ट-देवी हो। मंगलवार के दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिए। मनुवंश में उत्पन्न राजा मंगल की पूजनीया देवी हो। मंगलाधिष्ठात्री देवि ! तुम मंगलों के लिए भी मंगल हो। जगत् के समस्त मंगल तुम पर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मंगल प्रदान करती हो। मंगलवार के दिन सुपूजित होने पर मंगलमय सुख प्रदान करने वाली देवि ! तुम संसार की सारभूता मंगलधारा तथा समस्त कर्मों से परे हो।’
इस स्तोत्र से स्तुति करके भगवान् शंकर ने देवी मंगल-चण्डिका की उपासना की। वे प्रति मंगलवार के दिन उनका पूजन करके चले जाते हैं। यों ये भगवती सर्वमंगला सर्वप्रथम भगवान् शंकर से पूजित हुई। उनके दूसरे उपासक मंगल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मंगल ने तथा चौथी बार मंगलवार के दिन कुछ सुन्दर स्त्रियों ने इन देवी की पूजा की। पाँचवीं बार मंगल कामना रखने वाले बहुसंख्यक मनुष्यों ने मंगलचण्डिका का पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकर से सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्व में सदा पूजित होने लगी। मुने ! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव – सभी सर्वत्र इन परमेश्वरी की पूजा करने लगे।
जो पुरुष मन को एकाग्र करके भगवती मंगल-चण्डिका के इस मंगलमय स्तोत्र का श्रवण करता है, उसे सदा मंगल प्राप्त होता है। अमंगल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रों में वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मंगल ही दृष्टिगोचर होता है।

Print

, , ,

Mar
17

प्रकृतेर्ब्रह्माण्ड-मोहन-कवचम्
।। नारद उवाच ।।
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वज्ञानविशारद ।
ब्रह्माण्डमोहनं नाम प्रकृतेः कवचं वद ।।१
।। नारायण उवाच ।।
श्रृणु वक्ष्यामि हे वत्स कवचं च सुदुर्लभम् ।
श्रीकृष्णेनैव कथितं कृपया ब्रह्मणे पुरा ।।२
ब्रह्मणा कथितं सर्वे धर्माय जाह्नवी-तटे ।
धर्मेण दत्तं मह्यं च कृपया पुष्करे प्रभुः ।।३
त्रिपुरारिश्च यद् धृत्वा जघान त्रिपुरं पुरा ।
मुमोच ब्रह्मा यद् धृत्वा मधुकैटभयोर्भयम् ।।
संजहार रक्तबीजं यद् धृत्वा भद्रकालिका ।।४
यद् धृत्वा तु महेन्द्रश्च सम्प्राप कमलालयाम् ।
यद् धृत्वा च महाकालश्चिरजीवी च धार्मिकः ।।५
यद् धृत्वा च महाज्ञानी नन्दी सानन्दपूर्वकम् ।
यद् धृत्वा च महायोद्धा रामः शत्रुभयंकरः ।।६
यद् धृत्वा शिवतुल्यश्च दुर्वासा ज्ञानिनां वरः ।
ॐ दुर्गेति चतुर्थ्यन्तं स्वाहोन्तो मे शिरोऽवतु ।।७
मन्त्रः षडक्षरोऽयं च भक्तानां कल्पपादपः ।
विचारो नास्ति वेदेषु ग्रहणे च मनोर्मुने ।।८
मन्त्रग्रहणमात्रेण विष्णुतुल्यो भवेन्नरः ।
मम वक्त्रं सदा पातु ॐ दुर्गायै नमोऽन्ततः ।।९
ॐ दुर्गे रक्ष इति च कण्ठं पातु सदा मम ।
ॐ ह्रीं श्रीमिति मन्त्रोऽयं स्कन्धं पातु निरन्तरम् ।।१०
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति पृष्ठं च पातु मे सर्वतः सदा।
ह्रीं मे वक्षःस्थलं पातु हस्तं श्रीमिति संततम् ।।११
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पातु सर्वांगं स्वप्ने जागरणे तथा ।
प्राच्यां मां पातु प्रकृतिः पातु वह्नौ च चण्डिका ।।१२
दक्षिणे भद्रकाली च नैर्ऋते च महेश्वरी ।
वारुण्यां पातु वाराही वायव्यां सर्वमंगला ।।१३
उत्तरे वैष्णवी पातु तथैशान्यां शिवप्रिया ।
जले स्थले चान्तरिक्षे पातु मां जगदम्बिका ।।१४

।। फल-श्रुति ।।
इति ते कथितं वत्स कवचं च सुदुर्लभम् ।
यस्मै कस्मै न दातव्यं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् ।।१५
गुरुमभ्यर्च्यं विधिवद् वस्त्रालंकारचन्दनैः ।
कवचं धारयेद् यस्तु सोऽपि विष्णुर्न संशयः ।।१६
भ्रमणे सर्वतीर्थानां पृथ्वीव्याश्च प्रदक्षिणे ।
यत् फलं लभते लोकस्तदेतद्धारणे मुने ।।१७
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धमेतद् भवेद् ध्रुवम् ।
लोकं च सिद्धकवचं नास्त्रं विद्यति संकटे ।।१८
न तस्य मृत्युर्भवति जले वह्नौ विशेद् ध्रुवम् ।
जीवन्मुक्तो भवेत् सोऽपि सर्वसिद्धेशऽवरः स्वयम् ।।१९
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम् ।

।।इति श्रीब्रह्मवैवर्ते प्रकृतेर्ब्रह्माण्ड-मोहन-कवचं सम्पूर्णम् ।।
(प्रकृतिखण्ड । ६७ । १-१९॰५)

भावार्थः-
नारदजी ने कहा- समस्त धर्मों के ज्ञाता तथा सम्पूर्ण ज्ञान में विशारद भगवन् ! ब्रह्माण्ड-मोहन नामक प्रकृति-कवच का वर्णन कीजिये ।
भगवान् नारायण बोले- वत्स ! सुनो । मैं उस परम दुर्लभ कवच का वर्णन करता हूँ । पूर्वकाल में साक्षात् श्रीकृष्ण ने ही ब्रह्माजी को इस कवच का उपदेश दिया था। फिर ब्रह्माजी ने गंगाजी के तट पर ‘धर्म’ के प्रति इस सम्पूर्ण कवच का वर्णन किया था । फिर धर्म ने पुष्करतीर्थ में मुझे कृपा-पूर्वक इसका उपदेश दिया, यह वही कवच है, जिसे पूर्वकाल में धारण करके त्रिपुरारि शुव ने त्रिपुरासुर का वध किया था और ब्रह्माजी ने जिसे धारण करके मधु और कैटभ से प्राप्त होनेवाले भय का त्याग किया था। जिसे धारण करके भद्रकाली ने रक्तबीज का संहार किया, देवराज इन्द्र ने खोयी हुई राज्य-लक्ष्मी प्राप्त की, महाकाल चिरजीवी और धार्मिक हुए, नन्दी महाज्ञानी होकर सानन्द जीवन बिताने लगा, परशुरामजी शत्रुओं को भय देनेवाले महान् योद्धा बन गये तथा जिसे धारण करके ज्ञानि-शिरोमणि दुर्वासा भगवान् शिव के तुल्य हो गये ।
“ॐ दुर्गायै स्वाहा” यह मन्त्र मेरे मस्तक की रक्षा करे । इस मन्त्र में छः अक्षर हैं । यह भक्तों के लिये कल्प-वृक्ष के समान है । मुने ! इस मन्त्र को ग्रहण करने के विषय में वेदों में किसी बात का विचार नहीं किया गया है । मन्त्र ग्रहण करने मात्र से मनुष्य विष्णु के समान हो जाता है । “ॐ दुर्गायै नमः” यह मन्त्र सदा मेरे मुख की रक्षा करे । “ॐ दुर्गे रक्ष” यह मन्त्र सदा मेरे कण्ठ का संरक्षण करे । “ॐ ह्रीं श्रीं” यह मन्त्र निरन्तर मेरे कंधे की रक्षा करे । “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं” यह मन्त्र सदा सब ओर से मेरे पृष्ठ-भाग का पालन करे । “ह्रीं” मेरे वक्षःस्थल की और “श्रीं” सदा मेरे हाथ की रक्षा करे । “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं” यह मन्त्र सोते और जागते समय सदा मेरे सर्वांग का संरक्षण करे । पूर्व दिशा में प्रकृति मेरी रक्षा करे । अग्नि-कोण में चण्डिका दक्षिण दिशा में भद्रकाली, नैऋत्य-कोण में महेश्वरी, पश्चिम दिशा में वाराही और वायव्य-कोण में सर्व-मंगला मेरा संरक्षण करे । उत्तर दिशा में वैष्णवी, ईशान-कोण में शिवप्रिया तथा जल, थल और आकाश में जगदम्बिका मेरा पालन करे ।
वत्स ! यह परम दुर्लभ कवच मैंने तुमसे कहा है । इसका उपदेश हर एक को नहीं देना चाहिये और न किसी के सामने इसका प्रवचन ही करना चाहिये । जो वस्त्र, आभूषण और चन्दन से गुरु की विधिवत् पूजा करके इस कवच को धारण करता है, वह भी विष्णु ही है, इसमें संशय नहीं है । मुने ! सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा और पृथ्वी की परिक्रमा करने पर मनुष्य को जो फल मिलता है, वही इस कवच को धारण करने पर मिल जाता है । पाँच लाख जप करने से निश्चय ही यह कवच सिद्ध हो जाता है । जिसने कवच को सिद्ध कर लिया है, उस मनुष्य को रण-संकट में अस्त्र नहीं बेधता है। अवश्य ही जल या अग्नि में प्रवेश कर सकता है । वहाँ उसकी मृत्यु नहीं होती है । जिसको यह कवच सिद्ध हो गया है, वह निश्चय ही भगवान् विष्णु के समान हो जाता है।

Print

, , , ,

Mar
17

 

श्री महा-नवार्ण-मन्त्र साधन-विधि

गायत्रीः- “ॐ हूं घोर-रावायै विद्महे मुण्ड-मालिन्यै धीमहि तन्नो चामुण्डा प्रचोदयात् ।”
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीमहा-नवार्ण-मन्त्रस्य श्रीत्रिशिरात्मक ऋषिः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभः छन्दांसि, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-त्रिशक्ति-चामुण्डा देवता, ऐं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मोक्षार्थे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीत्रिशिरात्मक ऋषये नमः शिरसि, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभः छन्दंसे नमः मुखे, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-त्रिशक्ति-चामुण्डा देवतायै नमः हृदि, ऐं बीजाय नमः गुह्ये, ह्रीं शक्तये नमः पादयो, क्लीं कीलकाय नमः नाभौ, मोक्षार्थे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः- ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे अंगुष्ठाभ्यां नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे तर्जनीभ्यां नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे मध्यमाभ्यां नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे अनामिकाभ्यां नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः।
अंग-न्यासः- ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे हृदयाय नमः, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे शिरसे स्वाहा, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे शिखायै वषट्, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे कवचाय हुं, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे नेत्र-त्रयाय वौषट्, ॐ ऐं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
महा-शिव-दूती-न्यासः-
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं ततो देवी शरीरात् तु, विनिष्क्रान्ताति-भीषणा।
चण्डिका शक्तिरत्युग्रा, शिवा-शत-निनादिनी ।।१
(ह्रां हृदयाय नमः, हृदये शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं सा चाह धूम्र-जटिलमीशानमपराजिता।
दूतत्वं गच्छ भगवन् ! पार्श्वे शुम्भ-निशुम्भयोः ।।२
(ह्रीं शिरसे स्वाहा, शिरसि शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च, दानवावति-गर्वितौ।
ये चान्ये दानवास्तत्र, युद्धाय समुपस्थिताः ।।३
(ह्रूं शिखायै वषट्, शिखायां शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां, देवाः सन्तु हविर्भुजः।
यूयं प्रयात पातालं, यदि जीवितुमिच्छाथः ।।४
(ह्रैं कवचाय हुं, कवचे शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं बलावलेपादथ चेद्, भवन्तो युद्ध-कांक्षिणः।
तदागच्छत तृप्यन्तु, मच्छिवाः, पिशितेन वः ।।५
(ह्रौं नेत्र-त्रयाय वौषट्, नेत्र-त्रये शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ ह्रीं यतो नियुक्तो दौत्येन, तया देव्या शिव स्वयं ।
शिवदूति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमभागता ।।६
( ह्रः अस्त्राय फट्, अस्त्रे शिव-दूति ! श्री पादुकां पूजयामि नमः)

व्यापक-न्यासः- महा-नवार्ण-मन्त्रेण ॐ ह्रीं व्यापकाय नमो नमः।
ध्यानः-
ॐ अरुण-कमल-संस्था-तद्-रजः-पुञ्ज-वर्णा, कर-कमल-धृतेषटाभीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जातैर्भवतु भुवन-माता-सन्ततं श्रीः श्रिये नः ।।१
इन्दुः-प्रख्यामुन्दु-खण्डार्ध-मौलिं शंखाभीष्टाभीति-हस्तां त्रि-नेत्राम् ।
हेमाब्जस्थां पीत-वस्त्रां प्रसन्नां देवीं दुर्गां दिव्य-रुपां नमामि ।।२
पञ्चाशद्-वर्ण-भेदैर्विहित-वदनयोः पाद-हृत्-कुक्षि-वक्षा-देशां
भास्वत्-लपर्दाकलित-शशिकलामिन्दु-कुन्दावदाताम् ।
अक्ष-स्त्रक्-कुम्भ-चिन्ता-लिखित-वर-करां तीक्ष्ण-पद्मासनस्था-
मच्छाकल्पामतुच्छ-स्तन-जघन-भरां भारतीं तां नमामि ।।३
ॐ नवार्णवा महा-मालां, चामुण्डां त्रिपुरात्मकाम् ।
ह्रीं क्रीमैमों-बीज-रुपां, वन्दे देवीं श्रियं पराम् ।।४
(ह्रीं क्रीं ऐं ॐ)

महा-नवार्ण-मन्त्रः-
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महा-दुर्गे, नवाक्षरी, नव-दुर्गे, नवात्मिके, नव-चण्डी-महा-माये, महा-मोहे, महा-योग-निद्रे, जये, मधु-कैटभ-विद्राविणि, महिषासुर-मर्दिनि, धूम्रलोचन-संहन्त्रि, चण्ड-मुण्ड-विनाशिनि, रक्त-वीजान्तके, निशुम्भ-ध्वंसिनि, शुम्भ-दर्पघ्नि देवि ! अष्टादश-बाहुके, कपाल-खट्वांग-शूल-खड्ग-खेटक-धारिणी, छिन्न-मस्तक-धारिणी, रुधिर-मांस-भोजिनी, समस्त-भूत-प्रेतादि-योग-ध्वंसिनि, ब्रह्मेन्द्रादि-स्तुते देवि ! मां रक्ष रक्ष, मम् शत्रून् नाशय नाशय ह्रीं फट् हूं फट् ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” ।।१८१।।

पुरश्चरणः- प्रतिदिन ७०० जप कर ७०० आहुतियाँ देनी चाहिए।

Print

, , ,

Mar
07

शीतला माता- शीतला कवच

५१ शक्ति-पीठों में ‘कड़ा का शीतला-धाम’ एक प्रमुख शक्ति-पीठ है। सती का दाहिना कर (हाथ) इस स्थान पर गिरा था। इसलिए प्राचीन काल में इसे ‘कर्कोटक’ नगर भी कहते थे। यहाँ ‘कालेश्वर महादेव’ का प्राचीन मन्दिर है। कालेश्वर महादेव के नाम पर इसे ‘काल नगर’ भी कहा जाता है। यहाँ प्राप्त एक शिलालेख में इसका नाम ‘कट’ लिखा है।
‘कड़ा’ प्राचीन काल से इक पवित्र तीर्थ-स्थल है। यह प्रयाग-राज के उत्तर-पश्चिम दिशा में लगभग ४० मील की दूरी पर है।
पुराणों के अनुसार इस स्थान पर ‘विस्फोटक’ नामक दैत्य पैदा हुआ। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर आदि-शक्ति ने शीतला के रुप में प्रकट होकर इस दैत्य का नाश किया था। तभी से यहाँ देवी की उपासना से पिशाचकीय शक्तियों से मुक्ति और कामनाओं की पूर्ति होती है।
सर्व-कामना-पूरक ऋतु चसन्त और विस्फोटक शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी-शीतला देवी है।
इनकी पूजा हिन्दूओं के अतिरिक्त मुसलमानों और ईसाइयों द्वारा भी की जाती है। चैत्र कृष्ण-पक्ष की अष्टमी को शीतला की आराधना करने से पिशाचकीय शक्तियों और विस्फोटक कष्टों से रक्षा होती है। ‘स्कन्द-पुराण’ तथा ‘पद्म-पुराण’ के अनुसार शीतला देवी की पूजा से भयावह विस्फोटक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
चैत्र मास से आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चार अष्टमी, चार प्रमुख “शीतलाष्टमी” के रुप में तथा शेष ‘कालाष्टमी’ के रुप में आराध्य है।
शीतलाष्टमी पर्व पर विशेष रुप से इन्टरनेट पर प्रथम बार शीतला कवच

श्रीशीतला-कवचम्
।।पार्वत्युवाच।।
भगवन्, सर्व-धर्मज्ञ, सर्व-शास्त्र-विशारद ! शीतला-कवचं ब्रूहि, सर्व-भूतोपकारकम् ।।१
वद शीघ्रं महा-देव ! कृपां कुरु ममोपरि । इति देव्याः वर्च श्रुत्वा, क्षणं ध्यात्वा महेश्वरः ।।२
उवाच वचनं प्रीत्या, तत् श्रृणुष्व मम प्रिये ! शीतला-कवचं दिव्यं, श्रृणु मत्-प्राण-वल्लभे ।।३
।।ईश्वर उवाच।।
शीतला-सार-सर्वस्वं, कवचं मन्त्र-गर्भितं । कवचं विना जपेत् यो, वै नैव सिद्ध्यन्ति कलौ ।।४
धारणादस्य मन्त्रस्य, सर्व-रक्षा-करं-नृणाम् । कवचस्यास्य देवेशि ! ऋषिर्पोक्तो महेश्वरः ।
छन्दोऽनुष्टुप् कथितं च, देवता शीतला स्मृता। लक्ष्मी-बीजं रमा शक्तिः, तारं कीलकमीरितम् ।।५
लूता-विस्फोटकादीनि, शान्त्यर्थे परि-कीर्त्तितः । विनियोगः प्रकुर्वीत, पठेदेकाग्र-मानसः ।।६

विनियोगः- ॐ अस्य शीतला-कवचस्य श्री महेश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री-शीतला भगवती देवता, श्रीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ॐ कीलकं, लूता-विस्फोटकादि-शान्त्यर्थे पाठे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- श्री महेश्वर ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, श्री-शीतला भगवती देवतायै नमः हृदि, श्रीं बीजाय नमः गुह्ये, ह्रीं शक्तये नमः नाभौ, ॐ कीलकाय नमः पादयो, लूता-विस्फोटकादि-शान्त्यर्थे पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
ध्यानः-
उद्यत्-सूर्य-निभां नवेन्दु-मुकुटां सूर्याग्नि-नेत्रोज्ज्वलाम्,
नाना-गन्ध-विलेपनां मृदु-तनुं दिव्याम्बरालंकृताम् ।
दोर्भ्यां सन्दधतीं वराभय-युगं वाहे स्थितां रासभे,
भक्ताभीष्ट-फल-प्रदां भगवतीं श्रीशीतलां त्वां भजे ।।
।।कवच-मूल-पाठ।।
ॐ शीतला पातु में प्राणे, रुनुकी पातु चापाने । समाने झुनुकी पातु, उदाने पातु मन्दला ।।१
व्याने च सेढला पातु, मनुर्मे शंकरी तथा । पातु मामिन्द्रियान् सर्वान्, श्रीदुर्गा विन्ध्य-वासिनी ।।२
ॐ मम पातु शिरो दुर्गा, कमला पातु मस्तकम् । ह्रीं मे पातु भ्रुवोर्मध्ये, भवानी भुवनेश्वरी ।।
पातु मे मधुमती देवी, ॐ-कारं भृकुटी-द्वयम् ।।३
नासिकां शारदा पातु, तमसा वर्त्म-संयुतम् । नेत्रौ ज्वालामुखी पातु, भीषणा पातु श्रुतिर्मे ।।४
कपोलौ कालिका पातु, समुखी पातु चोष्ठयोः । सन्ध्ययोः त्रिपुरा पातु, दन्ते च रक्त-दन्तिका ।।५
जिह्वां सरस्वती पातु, तालुके व वाग्-वादिनी । कण्ठे पातु तु मातंगी, ग्रीवायां भद्र-कालिका ।।६
स्कन्धौ च पातु मे छिन्ना, ककुमे स्कन्द-मातरः । बाहु-युग्मौ च मे पातु, श्रीदेवी बगलामुखी ।।७
करौ मे भैरवी पातु, पृष्ठे पातु धनुर्धरी। वक्षः-स्थले च मे पातु, दुर्गा महिष-मर्दिनी ।।८
हृदये ललिता पातु, कुक्षौ पातु मग्हेश्वरी । पार्श्वौ च गिरिजा पातु, चान्न-पूर्णा तु चोदरम् ।।९
नाभिं नारायणी पातु, कटिं मे सर्व-मंगला । जंघयोर्मे सदा पातु, देवी कात्यायनी पुरा ।।१०
ब्रह्माणी शिश्नं पातु, वृषणं पातु कपालिनी । गुह्यं गुह्येश्वरी पातु, जानुनोर्जगदीश्वरी ।।११
पातु गुल्फौ तु कौमारी, पाद-पृष्ठं तु वैष्णवी। वाराही पातु पादाग्रे, ऐन्दराणी सर्व-मर्मसु ।।१२
मार्गे रक्षतु चामुण्डा, वने तु वन-वासिनी । जले च विजया रक्षेत्, वह्नौ मे चापराजिता ।।१३
रणे क्षेमंकरी रक्षेत्, सर्वत्र सर्व-मंगला । भवानी पातु बन्धून् मे, भार्या रक्षतु चाम्बिका ।।१४
पुत्रान् रक्षतु माहेन्द्री, कन्यकां पातु शाम्भवी । गृहेषु सर्व-कल्याणी, पातु नित्यं महेश्वरी ।।१५
पूर्वे कादम्बरी पातु, वह्नौ शुक्लेश्वरी तथा । दक्षिणे करालिनी पातु, प्रेतारुढा तु नैर्ऋते ।।१६
पाश-हस्ता पश्चिमे पातु, वायव्ये मृग-वाहिनी । पातु मे चोत्तरे देवी, यक्षिणी सिंह-वाहिनी ।
ईशाने शूलिनी पातु, ऊर्ध्वे च खग-गामिनी ।।१७
अधस्तात् वैष्णवी पातु, सर्वत्र नारसिंहिका । प्रभाते सुन्दरी पातु, मध्याह्ने जगदम्बिका ।।१८
सायाह्ने चण्डिका पातु, निशीथेऽत्र निशाचरी । निशान्ते खेचरी पातु, सर्वदा दिव्य-योगिनी ।।१९
वायौ मां पातु वेताली, वाहने वज्र-धारिणी । सिंहा सिंहासने पातु, शय्यां च भग-मालिनी ।।२०
सर्व-रोगेषु मां पातु, काल-रात्रि-स्वरुपिणी । यक्षेभ्यो यक्षिणी पातु, राक्षसे डाकिनी तथा ।।२१
भूत-प्रेत-पिशाचेभ्यो, हाकिनी पातु मां सदा । मन्त्रं मन्त्राभिचारेषु, शाकिनी पातु मां सदा ।।२२
सर्वत्र सर्वदा पातु, श्रीदेवी गिरिजात्मजा । इत्येतत् कथितं गुह्यं, शीतला-कवचमुत्तमम् ।।२३
।।फल-श्रुति।।
ब्रह्म-राक्षस-वेतालाः कूष्माण्डा दानवादयः । विश्फोटक-भयं नास्ति, पठनाद् धारणाद्यदि ।।१
अष्ट-सिद्दि-प्रदं नित्यं, धारणात् कवचस्य तु । सहस्त्र-पठनात् सिद्धिः, सर्व-कार्यार्थ-सिद्धिदम् ।।२
तदर्धं वा तदर्धं वा, पठेदेकाग्र-मानसः । अश्वमेध-सहस्त्रस्य, फलमाप्नोति मानवः ।।३
शीतलाग्रे पठेद् यो वै, देवी-भक्तैक-मानसः । शीतला रक्षयेन्नित्यं, भयं क्वापि न जायते ।।४
घटे वा स्थापयेद् देवीं, दीपं प्रज्वाल्य यत्नतः । पूजयेत् जगतां धात्रीं, नाना गन्धोपहारकैः ।।५
अदीक्षिताय नो दद्यात, कुचैलाय दुरात्मने । अन्य-शिष्याय दुष्टाय, निन्दकाय दुरार्थिने ।।६
न दद्यादिदं वर्म तु, प्रमत्तालाप-शालिने । दीक्षिताय कुलीनाय, गुरु-भक्ति-रताय च ।।७
शान्ताय कुल-शाक्ताय, शान्ताय कुल-कौलिने । दातव्यं तस्य देवेशि ! कुल-वागीश्वरो भवेत् ।।८
इदं रहस्यं परमं, शीतला-कवचमुत्तमम् । गोप्यं गुह्य-तमं दिव्यं, गोपनीयं स्व-योनि-वत् ।।९
।। मूल-मन्त्रः- “ॐ श्रीं ह्रीं ॐ” ।।
।।श्रीईश्वर-पार्वती-सम्वादे शक्ति-यामले शीतला-कवचं सम्पूर्णम्।।

लिंक्सः-
१॰ शीतलाष्टक
२॰ shitala

Print

,

Copy Protected by Chetan's WP-CopyProtect. Better Tag Cloud